"बेबसी, बीमारी और बाजारवाद" पर राष्ट्रीय वेबिनार

  " हिंसक और दानवी प्रवृत्ति का परिदृश्य है यह  ! " : सिद्धेश्वर 

मंडला--    बेबसी, बीमारी और बाजारवाद" पर आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार में विशिष्टअतिथि प्रो.(डॉ)शरद नारायण खरे (म. प्र)ने  कहा कि - " अप्रत्याशित रूप से आई किसी प्राकृतिक विपदा या बीमारी के समय लोगों की बेबसी/परेशानी/मजबूरी का फायदा उठाकर दवाओं व उपकरण की कालाबाज़ारी करना,तथा मेडीकल सामग्री को दुगने,चौगुने,दसगुने दामों पर बेचना या नकली सामग्री बेचना,इसे केवल हैवानियत ही माना जा सकता है।क्योंकि,प्राकृतिक विपदा के ऐसे माहौल में,मुनाफे की ऐसी नीयत न तो व्यापारवाद मानी जा सकती है,न ही बाज़ारवाद।"उन्होंने इस दूषित मानसिकता की भर्त्सना की,तथा मानवीय मूल्यों, उदारता, करुणा, संवेदना,परोपकार व सामाजिकता को बनाये रखने की अपील की।

          सिद्धेश्वर के संयोजन में  संचालित  फेसबुक के "अवसर साहित्यधर्मी  पत्रिका" के पेज पर आयोजित "हेलो फेसबुक  चर्चा-परिचर्चा के  अंतर्गत," बेबसी, बीमारी और बाजारवाद !" विषय पर अध्यक्षीय उद्बोधनदेते हुए, डॉ साधु शरण' सुमन'(संपादक :सद्भावना दर्पण) ने उपरोक्त उद्गार व्यक्त किया l

                   भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वाधान में आयोजित इस समय  संदर्भित आयोजन की मुख्य अतिथि डॉ  प्रतिभा कुमारी पराशर (सम्पादिका,  पद्मावत, हाजीपुर)  ने विषय से संदर्भित विचार व्यक्त करते हुए कहा - " आम लोग अपने प्रिय जनों के लिए अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं। हालत यह है कि कोई एक मरेगा तो दूसरे को बेड मिलेगा। जिंदगी की पूरी जमा पूंजी खर्च करनी पड़ रही है !अस्पतालों और दफ्तरों का चक्कर काटना और जहाँ तक फोन लगाते रहना एक मजबूरी बन चुका है। भूखे पेट, नंगे पैर सैंकड़ों किलोमीटर चलते रहना और रास्ते में ही मर जाना। बिना ऑक्सीजन के तड़प - तड़प के अपने परिजनों को मरते देखना। अपना सब कुछ खर्च कर किसी को बचा लेने की तीव्र इच्छा। सड़क, घर, अस्पताल हर जगह लाशें  गिर रही हैं।"

          वास्तव में,कोरोना महामारी ने मानवता की कल्याणवादी विचारधारा को थर्मामीटर लगा दिया और थर्मामीटर ने बतला दिया कि जो बाजार का कभी समाज था, आज बाजार का समाज हो गया है।बाजार कहता है, "मैं नीति नियम नहीं, केवल अधिकतम लाभ देखता हूं ।मुझसे लाभ लेना है तो मुंह मांगा दो और बस लोग दे रहे हैं! सांसों की कीमत लग रही है। दवा सुई के चौगुनी दाम लग रहे हैं। एंबुलेंस वाले किलोमीटर के हिसाब से नहीं बल्कि अपनी बेचैनी और बीमारी की गंभीरता के हिसाब से दाम ले रहे हैं ! कोरोना ने सबका बाजार बेजोड़ कर दिया है। सबसे अफसोस, चुनी हुई लोक कल्याणकारी सरकार की व्यवस्था होता है मगर,  बाजार उसे जनता के करीब जाने ही नहीं देता ! मजबूरन  उसे लूट जाना पड़ता है। क्योंकि आम जनता बाजार के समाज में खड़ा है, उसे लूट जाना है !क्योंकि वह बेबस है ।ऑक्सीजन की कालाबाजारी ,सुई की कालाबाजारी, दवा की जमाखोरी, ऑक्सीजन की जमाखोरी सरकारी एंबुलेंस  कि जमाखोरी,,.. ओह !हद हो गई है !लगता है व्यवस्था नाम की कोई चीज ही नहीं है। कोरोनावायरस थर्मामीटर ने सब की  पोल खोल दी है ।" हालांकि सभी एक जैसे नहीं हैं,मानवीय नज़रिया भी व्यापक रूप में फल-फूल रहा है,जो सुखद अहसास देता है।

            पूरी संगोष्ठी का  संचालन करते हुए,  संस्था के अध्यक्ष सिद्धेश्वर ने कहा कि - " आत्म चिंतन करने की जरूरत है कि इस भोगवादी  संस्कृति के  लिए कौन जिम्मेदार है ? हमारी सरकार ?, हमारी लचर कानून व्यवस्था ?? या हम खुद ! आखिर ऑक्सीजन, फल विक्रेता और दवाइयों के  जमाखोरों को पकड़ने के बाद,

  हम  उन्हें कितने दिनों की सजा दे पाते हैं ?2 साल, 4 साल ? या फिर अपराधियों के द्वारा, भरी पूरी रकम देने के बाद,  जेल से बाहर आकर फिर वही धंधा शुरू देते हैं वे अपराधी lफिर क्यों डरेंगे, ऐसे अपराधी लोग ? 

 सरकार की पूरी जिम्मेदारी होती है l किन्तु कोई भी सरकार, खुद दूध का धुला हो, तब न ?

           ऐसे में, क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं होती ?

 या फिर कहीं ना कहीं से, हम में से अधिकांश लोग  उनके ही  पक्षधर नहीं होते हैं ?अफसोस कि हम अपने भाई, बहनों, रिश्तेदारों को  इस तरह लाश  होते हुए देख कर भी,  पसीज नहीं रहे हैं,  बल्कि और दिल को कठोर कर ले रहे हैं l  यह बाजारवादी लोग, हिंसक चील  बन जिन्दा लाश के ऊपर मंडरा रहे हैं l यह हिंसक  और दानवी प्रवृत्ति नहीं है क्या ? " 

                          डॉ ऋचा वर्मा ने कहा कि - " बीते दो वर्षों से इंसानियत बेबस है । एक अदृश्य सूक्ष्म जीवी ने मानो प्रलय का संदेश देकर पूरी मानवता को त्राहिमाम-त्राहिमाम उच्चारित करने पर विवश कर दिया है। कोरोना का उद्गम जहां से भी हुआ हो,पर मुझे तो लगता है कि यह ईश्वर का पेस्टिसाइड्स कार्यक्रम है। जिस प्रकार हम अपने घरों को कीड़ों-मकोड़ों से मुक्त करने के लिए पेस्ट कंट्रोल करवातें हैं!ठीक  उसी प्रकार प्रकृति अपने तरीके से पेस्ट कंट्रोल कराने पर आमादा है।"

        विजयानंद विजय ( मुजफ्फरपुर ) ने कहा कि - " आज के इस विकट समय में जहाँ कोरोना महामारी के चलते पूरा देश परेशान है, बेबस है, लाचार और बेहाल है, जिंदगियाँ दाँव पर लगी हुई हैंं और चारों और कुव्यवस्था का आलम है, इंसानियत के दुश्मन और मौत के सौदागर अपना ईमान-धर्म बेचकर इस संकटकाल में भी निर्मम व्यापार करने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं।यह निहायत ही शर्मनाक, निंदनीय और अमानवीय कृत्य है, जिसे ईश्वर भी  कभी माफ नहीं करेगा।इंसान की बेबसी और मजबूरी का फायदा उठाकर जीवन रक्षक दवाओं, आक्सीजन सिलिंडर आदि का कृत्रिम अभाव पैदा कर जो जमाखोरी और कालाबाजारी की जा रही है, वह अब किसी से छुपी नहीं है।"

                 राज  प्रिया रानी ने विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि - " । बड़ी हस्ती से लेकर गरीब परिवार की जिंदगी मौत के साए में डूबा जा रहा है। यह भयावह दृश्य से कहीं ज्यादा बदतर और दर्दनाक तब हो जाता है जब प्राकृतिक आपदा में भी इंसान  अपनी रिश्वतखोरी एवं मुनाफा खोरी को अहमियत देते हैं। दरअसल वह इंसान नहीं हैवान बन जाते हैं। यह बदतर परिस्थिति इंसानों द्वारा गढ़ी हुई दरिंदगी है जो एक इंसान दूसरे इंसान के साथ सुलूक करता है। ऐसे असामाजिक गिरोहों का पर्दा फाश होता है तब उसे या तो जेल की सलाखों के पीछे या सामान्य लोगों द्वारा मारपीट काश शिकार हो जाते हैं। इससे ज्यादा और कोई सजा नहीं मिलती।  ऐसे लोगों को मृत्युदंड मिलनी चाहिए, तभी सुधार की गुंजाइश है !"

             नरेंद्र  कौर छाबड़ा (औरंगाबाद, महाराष्ट्र ) के शब्दों में - "   हमारे सभ्य  समझे जाने वाले समाज में भी लालच, स्वार्थ इस कदर बढ़ने लगा है कि उन्हें अपने व्यवहार पर कोई अपराध बोध,आत्मग्लानि   नहीं होती, जो ऐसे दुखद अवसर का भी लाभ उठाने में लग जाते हैं !कठोर और निर्दयी बन जाते हैं! वे स्वयं इन मजबूर लोगों के स्थान पर, स्वयं को रख कर देखें, तो शायद उनके दर्द का एहसास उनकी संवेदनहीनता को कुछ कम कर सके !"

              अपूर्व कुमार (हाजीपुर ) ने कहा कि - " बाजार के दलाल आवश्यक वस्तुओं की कमी दिखलाकर, उसे आम लोगों को मंहगे दामों पर खरिदने को विवश करते हैं।जो भी इसमें सम्मिलत हैं उसे पकड़ कर कड़े से कड़ा दण्ड दिया जाना चाहिए। वैसे इस दंड के बावजूद ईश्वर के दंड से नहीं बच पाएंगे। "

                     मीना कुमारी परिहार के विचार से - " कुदरत के आगे हम पहले भी जीरो थे,आज भी जीरो हैं।कार है,पैसा है,दुकान है, फैक्ट्री है,सोना चांदी, बहुत सारे कपड़े भी हैं,सब जीरो जैसे हो गए  हैं। इस कोरोना काल में इंजेक्शन ,नकली दवाई, प्लाज्मा, मेडिकल उपकरण बेचने वालों से एक सवाल है..? जब लोग मेहनत की कमाई खर्च कर अपनों को नहीं बचा रहे हैं तो तुम्हारी पाप की कमाई से तुम्हारे परिवार का,और तुम्हारा क्या हाल होगा ?

              इस कार्यक्रम को देशभर के चार  सौ से अधिक लोगों ने देखा, जिनमें प्रमुख हैं- "डॉ शिवनारायण,निविड़ शिवपुत्र,संजय रॉय,  दुर्गेश मोहन, नीरज कुमार, मधुरेश नारायण, संतोष मालवीय, राम नारायण यादव आदि !

--प्रो(डॉ)शरद नारायण खरे