माँ की ममता

सूनी  आँखों  में भी  वो  सपने सजा  देती है,

माँ  कड़ी  धूप में  आँचल  में  छुपा  देती  है।

कर्ज़  हम  उसकी  मुहब्बत का  उतारें  कैसे,

वो तो  हर  रोज़  मुहब्बत  की  दुआ  देती है।

उस की हर  बात  में है  जाने  ये जादू  कैसा,

बात  बातों   में  ही  हर  बात  बना  देती  है।

उसकी बाहों में  ज़माने  की हैं खुशियाँ सारी,

भरके बाहों में वो  जन्नत  भी  दिखा  देती है।

अपनी आँखों में  वो कुछ ख़्वाब सुहाने लेके,

हम  में कुछ  ख़्वाब  नये रोज़  जगा  देती है।

उसकी हर एक छुअन लगती है मरहम जैसी,

एक  बोसे  से  वो  हर  ज़ख्म  मिटा  देती है।

उसकी ममता का नहीं मोल  कोई  दुनिया में,

अपनी ममता से ही  जीना वो  सिखा देती है।

इंदु मिश्रा'किरण' वरिष्ठ कवयित्री व 

गज़लगो,शिक्षिका व लेखिका,नई दिल्ली