स्वर्ग और नर्क

एक बार एक सामान्य नागरिक ख़ूब पूजा पाठ करता था और दान भी अपनी हैसियत के हिसाब से कर लेता था।

एक दिन उसके छोटे से बेटे ने पूछा की बाबा आप ये सब पूजा पाठ,दानधर्म करते है तो उसका फल क्या मिलेगा?

वह बेचारा सोच में पड़ गया कि मैं तो बड़ी श्रध्दा से करता हूं, कभी ये सब तो सोचा ही नहीं।ऐसा ही सोचता बैठा था कि उसका मित्र आया तो उसीसे पूछ बैठा ।वो भी थोड़ी देर सोच में पड़ गया फिर बोला ,

शायद स्वर्ग में जगह मिल जाए तुम्हे ,नर्क नहीं जाना पड़ेगा।

 वो यही सोचता सोचता सो गया।प्रात: उठ नित्य क्रम से फारिग हो गुरुजी के पास चल पड़ा।गुरुजी से प्रणाम किया और अपनी दुविधा के बारे मे बताया।

गुरुजी मुस्कुराए और बोले,सुनो,

एकबार एक साधु भ्रमण करता करता नर्क मे पहुंच गया बड़ा ही सुंदर बना था ,बगिया ,फल फूल और हरियाली वो सोच में पड़ गया,और सोचा ये भी बुरा नहीं है।ये ऐसा है तो स्वर्ग कैसा होगा?

वहीं पास में एक सेवक खड़ा था उससे पूछ ही लिया, की इतना सुंदर नर्क है स्वर्ग तो और सुंदर होगा। सेवक मुस्कुराया और बोला अभी आपने पूरा देखा कहा है? चलिए आगे,

वह से उनको भोजनालय में ले गया, वहा सन एक लाइन में बैठे थे,सब के हाथ में 1 फूट का चमच बंधा हुआ था,जो खाने को चमच में भर के मुंह की ओर लेने की कोशिश करता तो खाना कंधे के पीछे गिर रहा था,और वो सभी बार बार मुंह मे डालने की कोशिशों में निष्फल हो रहे थे।सब की हड्डियां दिख रही थी और कंकाल से दिख रहे थे।

फिर वही सेवक उन्हें स्वर्ग में ले गया।वही नजर जो वहा दखा था ,खुब  अच्छा लगा,पर वो उत्सुक था भोजनालय देखने को।

 भजनालय पहुंचकर देखा तो हैरान रह गया यहतो वहासे भी बड़े चम्मच बंधे थे हाथों में सब आमने सामने कतार में बैठे थे बीच में भोजन रखा था और चमच से एकदूसरे को खाना खिला रहे थे ।मुंह पर तृप्ति के भाव और शारीरिक और मानसिक तौर से बहुत ही तंदुरस्त दिख रहे थे।

वह गरीब नागरिक गुरुजी से पूछ बैठा की इसका मतलब क्या हुआ? तो गुरुजी ने समझाया जहां पर एका है वहा सुख का वास है,स्वर्ग में एकता दिखी,सब एकदुसरे की मदद कर के सुखी थे,और नर्क में सब स्वर्थरत अपना अपना ही सोच रहे थे।

क्या ये कथा सार आज के समय में जरूरी नहीं है? आपदा के समय में एकता बहुत जरूरी है,स्वार्थ से परे होने से ही एकता का उद्भव होता है।


जयश्री बिर्मी

स्वरचित पुरानी कहानियों मैं से

अहमदाबाद

pH no 9428123188