सोच,पर्दा और कोरोना

रखीराम नाम का एक व्यक्ति था ।वह एक गांव में रहता था ।जो  मजदूरी करके अपने परिवार का पालन पोषण करता था । सन 2020 मार्च में चीन से कोरोनावायरस आया जो कि बहुत ज्यादा खतरनाक था ।यह वायरस पूरे विश्व में फैला हुआ था ।भारत में  भी इसने अपने पैर पसार लिए और धीरे-धीरे इसने भारत की अर्थव्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था और  सांस्कृतिक व्यवस्था को प्रभावित किया ।

रखी राम अपने गांव से बाहर जाकर एक शहर में काम करता था जैसे कि वजन उठाने का काम अन्य कोई मजदूरी  वाले काम करता था । उसे कुछ रुपए मिल जाते थे जिससे वह परिवार का पालन पोषण करता था ।कोई भी व्यक्ति जब वहां से आता था उसके द्वारा वह रुपए भेज देता था ।या जब कभी वह अपने घर आता था तो रुपए लेकर आता था ।लेकिन यह रुपए उसके परिवार के लिए पर्याप्त तो नहीं थे ।पर फिर भी वह किसी तरह अपना परिवार चला रहा था और परिवार में सभी बच्चे थोड़ी पढ़ाई भी कर रहे थे ।

कोरोना की बजह से कारखाने बंद हो गए और वाहन चलने बंद हो गए । पैदल चलकर वह घर आया। पैरों में छाले पड़ गए ।कमरे का किराया देकर उसके पास कुछ ही रुपए बचे थे ।

अब घर में उसकी पत्नी बड़े हिसाब से खर्चा कर रही थी । स्कूल बंद हो गए बच्चे घर पर ही सारा दिन थे । भूख भी ज्यादा लगती । माँ सब्जी और दाल  बहुत पतली कर देती तो बच्चे देखकर रोते थे । माँ भी बहुत दुखी हो जाती थी और रोने लगती थी ।

वह लकड़ियाँ बीन कर लाती थी ।  एक दिन पुलिस का पहरा था और वह लकड़ियां लेने भी न जा सकी । घर में बहुत ही ज्यादा परेशानी हो गई थी ।आटा भी थोड़ा ही बचा था ।उसने घर में बच्चों  के पढ़ने के जो कागज थे वे  सारे इकट्ठे किए और किसी भी तरह से उन कागजों से अंगीठी  पर रोटी बनाई ।क्योंकि उसके घर में गैस का सिलेंडर ही नहीं था ।गैस चूल्हा नहीं था और फिर वह लेती  भी कैसे ।

रखीराम और उसकी पत्नी घर के बाहर कम जा पा रहे थे ।

व्यवस्था  बहुत ख़राब होने लगी । पड़ोस से खाने की खुश्बू आती तो बच्चों का भी मन करता ।रखीराम और उसकी पत्नी बहुत चिंतित थे । रखीराम  चाहता था कि उसके घर पर कोई नहीं आए ।जबकि ऐसा माहौल था कि कोई किसी के घर पर नहीं जा रहा था लेकिन छोटे-छोटे गांव में ऐसा नहीं था ।फिर भी लोग एक दूसरे के घर जा रहे थे।

वह  चाहता था कि उसके घर के बारे में किसी को पता न चले कि उसके घर पर क्या खाया जा रहा है?क्या पिया जा रहा है?वह  नहीं चाहता था कि लोग उसके बारे में जाने ।क्योंकि लोग जान भी जाएंगे तो क्या करेंगे?क्या उसको आटा दाल रोटी सब कुछ देकर जाएंगे?उसके अंदर आत्म सम्मान की भावना आ रही थी कि वह किसी से मांगने जायेगा तो क्या मिल रहा है ।एक छोटे  से  थैले  में थोड़ा सा सामान मिलेगा । उसका भी फोटो खिचेगा । क्या हो सकता है क्योंकि उसका  जीवन सिर्फ दो  दिन का तो नहीं है ।उसे तो आगे भी जीना है ।वह बहुत ही परेशान रहने लगा था कि वह क्या करे। इतना परेशान हो गया कि घर के दरवाजे पर टाट का पर्दा टांग दिया । दूध की  बात तो  दूर चाय बनना बंद हो गयी थी।लोग तरह -तरह की बात करने लगे । रखीराम को घमंडी बताने लगे । बाहर से पैसा ज्यादा ले आया होगा । लोग कहने लगे ।कोई कुछ कहता तो  कोई कुछ कहता । रखीराम को बड़ा मुश्किल हो गयी थी ।हर कोई परदे पर नज़र रखता । पर्दा चर्चा का विषय बन गया था ।

रखीराम कई लोगों से रूपये उधार ले चुका था । वह समाज सेवियों के पास नहीं गया ।

वह चाहता था उसके बच्चे मूंगफली और केले के छिलके बाहर नहीं देखें जो पड़ोसी बाहर डाल देते ।एक दिन वह बैठा- बैठा सोच रहा था ।फिर उसे पता चला कि अब लॉकडाउन हट गया है । वह बच्चों से कहता, "तुम्हें कुछ ठीक नहीं लगता तो मां को यह मत दिखाओ कि तुम्हें यह सब पसंद नहीं और तुम उसको समझने की कोशिश करो । आगे  सब कुछ ठीक हो जाएगा । इसमें कुछ वक्त लगेगा । एक वक्त खाना मिले तो दूसरे वक्त पानी ही पी लो ।"

अब बच्चे समझने लगे थे जैसा उनको मिल जाता वैसा ही खा लेते थे । अब कुछ ही दिनों में खेत में कुछ काम होने लगा तो उसके बच्चों ने कहा, " पापा हम लोग भी खेत में काम करने चले जाएंगे ताकि हमें कुछ पैसे मिल सकें । "

तो रखी राम ने कहा,"नहीं बेटा,तुम इतने छोटे हो कैसे काम कर पाओगे।तुम नहीं कर पाओगे। मैं ही काम करने चला जाऊंगा ।मुझे तो काम करना ही है । "

रखी राम के बच्चे भी बहुत ज्यादा जिद करने लगे । रखी राम ने कहा, "ठीक है चलो तुम भी काम करना चाहते हो तो ।" उसके बच्चे दोनों खेत में काम करने लगे । उसकी पत्नी  घर के बहुत सारे कार्य करती थी । क्योंकि उसके यहाँ  एक गाय पलती  थी ।वह दूध नहीं दे रही थी । यह भी एक समस्या थी । उसे भी खाने को चाहिए था । उपले भी जरा से होते दिन भर के गोबर से चार या तीन ।

उसका भी सारा काम करना होता था ।

एक दिन एक पड़ोसी ने आवाज लगायी । रखीराम बाहर गया ।  पड़ोसी बोला," रखीराम के मिजाज बदल गए हैँ । कोरोना ने घमंड भी दे दिया । पर्दा तो देखो "

(जो पर्दा अब किबाड़ के ऊपर था ।)

कहकर वह हंसा । रखीराम ने कहा, "आप मुझे यह कह कर शर्मिंदा न करो कि मैं यह सारी बात बताऊं ।मैं इतना ज्यादा तंग आ गया था कि मेरा दिमाग़ ख़राब हो रहा था । मेरे पास पैसे नहीं थे और खाने पीने की बहुत ज्यादा दिक्कत हो रही थी। बच्चों को देखकर  मुझे अपने आपको बहुत ज्यादा महसूस हो रहा था ।मैं क्या करूं मैं नहीं चाहता था कि मेरे घर पर कोई आए । और आकर देखे कि मेरे बच्चे बहुत परेशान हो रहे हैं और मैंने देखा कि कहीं पर भी कुछ बांटा जा रहा है तो वह भी पर्याप्त नहीं ।

जो एक या दो  दिन के लिए पर्याप्त होता वह ।"

रखीराम कुछ देर चुप रहा और बोला, " फिर मैंने अपने घर पर पर्दा  टांग दिया और आज मैंने पर्दा इसलिए  हटा दिया है क्योंकि अब मैं खेत पर थोड़ा काम कर रहा हूं और मेरे बच्चे भी साथ चले जाते हैं ।जिससे मुझे थोड़े बहुत पैसे मिल रहे हैं और मैं उससे जैसे तैसे अब गुजारा कर सकता हूं ।"

पर्दा सिर्फ पर्दा होता है । हकीकत जानने से पता चलती है ।

पूनम पाठक बदायूँ