संघ ने सरदार पटेल को सांप्रदायिक और कट्टरवादी छवि दे दी....

(पवन सिंह)

सरदार पटेल के नाम का संघ ने अपने तरीके से इस्तेमाल किया।‌ सरदार पटेल बेशक हिंदूवादी थे, पारंपरिक थे और प्रखर राष्ट्रवादी थे लेकिन सरदार पटेल ने कभी भी हिंदू राष्ट्र की बात नहीं की, कट्टरता की बात नहीं की, मुसलमानों से कतई नहीं कहा कि वो देश छोड़ कर चले जाएं। हां! उन्होंने यह साफ किया कि मुसलमानों को दो नावों पर पैर नहीं रखना चाहिए....। चालाक संघ ने बड़ी ही खूबसूरती से सरदार पटेल के मुसलमानों पर की गई टिप्पणियों को अपने हित के हिसाब से निकाला और छांटा और फिर उस पर "अपने हिसाब वाले" तथाकथित प्रखर राष्ट्रवाद और हिंदू राष्ट्र का मुलम्मा चढ़ाया और उसे पेश कर दिया। 

संघ ने सरदार पटेल जैसे एक प्रखर राष्ट्रवादी, गांधी के सपनों का भारत बनाने की बात कहने वाले और खरा बोलने वाले एक नेता को "सांप्रदायिक" जामें में फिट कर दिया। मुसलमानों के बारे में सरदार वल्लभभाई पटेल की राय को लेकर उनके जीते जी भी सवाल उठते थे। पिछले कुछ सालों में ये मसला बहस में है  “लाइफ एंड वर्क्स ऑफ सरदार वल्लभभाई पटेल” संपादित-श्री पी.डी.। इस किताब को पढ़िएगा तो सच नजर आएगा। इसमें सरदार पटेल के भाषणों और वक्तव्यों का संकलन है।   किताब की प्रस्तावना में देश के पहले भारतीय गवर्नर जनरल सी राजागोपालचारी ने लिखा है- “वल्लभभाई गांधीजी जी के लिए वही स्थान रखते थे जो लक्ष्मण श्री राम के लिए थे। जो लोग रामचंद्र और सीता की आराधना करते हैं उनसे इससे ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं।”  पटेल जी खरे आदमी दे और खरी बात करते थे। वो मुस्लिम लीग की हरकतों से भी खांसे नाराज रहते थे और RSS की हरकतों से भी।

मुसलमानों की देशभक्ति पर सरदार पटेल ने कहा-….अगर नए स्वतंत्र लोकतांत्रिक देश भारत को एशियाई देशों का नेतृत्व करना है और विदेशी प्रभुत्व को खत्म करना है तो सांप्रदायिक और कारोबारी सौहार्द्र बनाए रखना जरूरी है। मैं मुसलमानों का सच्चा दोस्त हूं, हालांकि मुझे उनका सबसे बड़ा दुश्मन बताया जाता रहा है। मैं सीधी बात करने में यकीन रखता हूं। मैं उनसे साफ कहना चाहता हूं कि इस नाजुक मोड़ पर केवल भारतीय संघ (भारतीय संघ का यहां तात्पर्य RSS से नहीं है बल्कि संयुक्त भारत से है) के प्रति वफादारी की घोषणा से उन्हें मदद नहीं मिलेगी। उन्हें इसका व्यावहारिक प्रमाण पेश करना होगा। मैं उनसे पूछता हूं कि आप भारतीय इलाकों पर सीमावर्ती कबायलियों की मदद से किए गए पाकिस्तानी हमले की बगैर हीलाहवाली के निंदा क्यों नहीं करते? क्या ये उनका दायित्व नहीं है कि वो भारत पर होने वाले हर हमले की निंदा करें? मुसलमानों को देश से निकालने पर सरदार पटेल ने कहा--अभी हमने सुना कि कुछ लोग चिल्ला रहे थे कि मुसलमानों को देश से बाहर कर देना चाहिए। जो लोग ऐसा कह रहे हैं वो गुस्से से पागल हो गये हैं। एक पागल उस आदमी से थोड़ा बेहतर ही होता है जो क्रोध में पागल हो। पागल का तो इलाज हो सकता है और शायद वो ठीक भी हो जाए लेकिन क्रोध में पागल व्यक्ति तो पूरी तरह आत्म नियंत्रण खो देता है। ऐसे लोग समझ नहीं पाते कि मुट्ठीभर मुसलमानों को बाहर निकालने से कुछ नहीं हासिल होने वाला है। हमें उन लोगों से सहानुभूति है जिन्हें अपने प्रियजन और संपत्ति का नुकसान सहना पड़ा है….लेकिन हमें इसे सहना पड़ेगा। साथ ही साथ हम जब तक सरकार में हैं, हमें शासन करना होगा। अगर हम जाति, धर्म या संप्रदाय से ऊपर उठकर देश के सभी नागरिकों के अभिभावक के तौर पर शासन नहीं कर सकते तो हम उस पद पर रहने के अधिकारी नहीं जहां आज हम हैं। इसलिए ऐसी मांगे मुझे चिंतित और परेशान करती हैं। मैं खुद से साफ शब्दों में पूछता हूं कि “क्या हमें दुनिया के सामने ये मान लेना चाहिए कि हम शासन के योग्य नहीं हैं?”

सरदार पटेल कहते हैं…."मैं साफ बात करने वाला आदमी हूं। मैं हिंदुओं और मुसलमानों दोनों से कड़वी बातें कहता हूं। साथ ही मैंने हमेशा कहा है कि मैं मुसलमानों का दोस्त हूं। अगर मुस्लिम मुझे दोस्त स्वीकार नहीं करते तो वो भी पागलों की तरह बरताव करेंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि वो सही और गलत का भेद नहीं कर पा रहे। लेकिन उनके इस रवैये की वजह से मैं सत्य से नहीं विमुख हो सकता। मैं अपने कर्तव्य से मुंह नहीं मोड़ सकता।"

सरदार पटेल गांधीजी की आंखों से गांधी का राम राज्य देखना चाहते थे। पटेल जी कहते हैं--…."मैं आपसे गांधीजी के कार्यक्रम को लागू करने की अपील करता हूं। गांधी ने अपनी तपस्या से आजादी हासिल की। मैं आपको बताता हूं कि आप गांधीजी के सपनों का राम राज्य कैसे ला सकते हैं। इसके लिए पहला काम हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करना है। दूसरा काम है छुआछूत दूर करना। तीसरा काम है आत्म निर्भर बनना…अपनी संस्कृति की सर्वोत्तम चीजों का संरक्षण कीजिए और अपने विचारों के लिए निस्वार्थ भाव से समर्पित हो जाइए। अगर आप ऐसा कर पाए तो आप अपने लक्ष्य जरूर प्राप्त कर लेंगे और राम राज्य की स्थापना कर सकेंगे।" हिंदू राष्ट्र बनाम सेकुलर राष्ट्र पर सरदार पटेल के उद्गार हैं-

"…जहां तक सेकुलर बनाम हिंदू राज्य का सवाल है, तो हिंदू राज्य पर चर्चा को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है। भारत में करीब साढ़े चार करोड़ मुसलमान हैं। उनमें से कइयों ने पाकिस्तान के निर्माण में सहयोग दिया था। कोई ये कैसे मान ले कि वो रातों रात बदल जाएंगे? मुस्लिम कहते हैं कि वो देशभक्त नागरिक हैं और किसी को उनकी देशभक्ति पर शक क्यों करना चाहिए? मैं उनसे कहूंगा: “आप हमसे क्यों पूछते हैं? अपनी आत्मा को टटोलिए।…मैं भारतीय मुसलमानों से एक ही सवाल पूछना चाहता हूं। हाल में हुए आल इंडिया मुस्लिम कॉन्फ्रेंस में आपने कश्मीर मुद्दे पर मुंह क्यों नहीं खोला? आपने पाकिस्तान की करतूत की निंदा क्यों नहीं की? इन बातों से लोगों के जहन में संशय पैदा होता है। इसलिए मैं मुसलमानों का दोस्त होने के नाते एक बात कहना चाहता हूं और एक अच्छे दोस्त का फर्ज है कि वो साफ बात कहे। अब ये आपका फर्ज है कि एक नाव में साथ-साथ सफर करें और साथ डूबें या साथ तैरें। मैं आपसे साफ कहता हूं कि आप एक साथ दो घोड़ों की सवारी नहीं कर सकते। आपको जो बेहतर लगे वो एक घोड़ा चुन लीजिए।"

आइए RSS पर सरदार पटेल के विचारों से आपको अवगत कराता हूं। सरदार पटेल कहते हैं--"मैं आरएसएस को कांग्रेस में शामिल होने का न्यौता देता हूं और कहता हूं कि वो देश में अशांति पैदा करके प्रशासन को पंगु न बनाएं। मैं समझता हूं कि वो स्वार्थ से प्रेरित नहीं हैं लेकिन वक्त की मांग है कि वो सरकार के हाथ मजबूत करें और शांति बहाली में मदद करें। हिंसा का सहारा लेकर वो देश की सच्ची सेवा नहीं कर सकते।"....

RSS की तमाम हरकतों से परेशान होकर कांग्रेस के तमाम नेता उस पर कड़ी कार्यवाही करने के पक्षधर थे लेकिन सरदार पटेल नहीं। सरदार पटेल कहते हैं-"आप डंडे के जोर पर किसी संगठन को नहीं कुचल सकते। डंडा तो चोरों और डकैतों के लिए होता है. संघ तो देशभक्त है। उसे अपने देश से प्यार है। बस उनके सोच की दिशा थोड़ी भटक गई है. कांग्रेस के लोगों को उन्हें प्यार से जीतना होगा।" मगर ये गांधी के हत्या से पहले की बात है। 30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधी को गोली मार दी। इसके बाद काफी चीजें बदल गईं। इसके बाद  RSS को लेकर पटेल के विचार काफी बदल गए। उन्हें समझ आ गया था कि गांधी की हत्या की जड़ वही हिंदूवादी सांप्रदायिकता है, जिसका जहर फैलाने में RSS का बड़ा हाथ है।

पटेल और गांधी के बीच गुरु-शिष्य के अलावा उनके बीच बेहद भावुक सा एक रिश्ता भी था। गांधी की हत्या नेहरू और पटेल दोनों के लिए असहनीय थी। गांधी की हत्या के एक महीने बाद 27 फरवरी, 1948 को नेहरू को भेजी गई अपनी चिट्ठी में पटेल ने लिखा था-

"गांधी की हत्या में RSS शामिल नहीं था। ये काम हिंदू महासभा के एक कट्टर धड़े का था, जो सीधे सावरकर के नेतृत्व में काम कर रहा था। उसी ने ये साजिश बनाई।  मगर गांधी की हत्या का स्वागत किया संघ और महासभा ने। ये लोग गांधी की विचारधारा, उनकी सोच के सख्त खिलाफ थे।" जैसे-जैसे जांच बढ़ी, पटेल को महसूस होता गया कि संघ का सीधे-सीधे हत्या में हाथ न सही, लेकिन उसकी फैलाई सांप्रदायिक नफरत ने स्थितियां जरूर खराब कीं। गांधी की हत्या के बाद उन्होंने RSS पर प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि तकरीबन डेढ़ साल बाद ये बैन हटा भी दिया उन्होंने। मगर RSS की विचारधारा और गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए पटेल ने ये भी साफ कर दिया कि संघ राजनीति में हिस्सा नहीं ले पाएगा। 'संघ की गतिविधियों से भारत सरकार के लिए खतरा पैदा हुआ’ तो उन्होंने 18 जुलाई, 1948 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक चिट्ठी भेजी थी. ये चिट्ठी काफी चर्चित है। आप भी पढ़िए-

"गांधी जी की हत्या का केस अभी कोर्ट में है। इसीलिए RSS और हिंदू महासभा, इन दोनों संगठनों के शामिल होने पर मैं कुछ नहीं कहूंगा.श लेकिन हमारी रिपोर्ट्स में इस बात की पुष्टि होती है कि जो हुआ, वो इन दोनों संगठनों की गतिविधियों का नतीजा है। खासतौर पर RSS के किये का।  देश में इस तरह का माहौल बनाया गया कि इस तरह की भयानक घटना मुमकिन हो पाई। मेरे दिमाग में इस बात को लेकर कोई शक नहीं कि हिंदू महासभा का कट्टर धड़ा गांधी की हत्या की साजिश में शामिल था। RSS की गतिविधियों के कारण भारत सरकार और इस देश के अस्तित्व पर सीधा-सीधा खतरा पैदा हुआ।" इन्हीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अक्टूबर 1951 में जनसंघ की नींव रखी। यही जनसंघ आगे चलकर बीजेपी बना। वर्ष 1948 को सरदार पटेल जी ने गोलवलकर के नाम एक चिट्ठी भेजी। गोलवलकर उस समय RSS के सरसंघचालक, उसके मुखिया थे. पटेल ने उन्हें लिखा था-

भाई श्री गोलवलकर,

11 अगस्त को भेजा आपका पत्र मिला। जवाहरलाल ने भी मुझे उसी दिन आपका पत्र भेजा।  आप RSS को लेकर मेरे विचार अच्छी तरह जानते हैं। लोगों ने उस विचार का स्वागत किया था।  मुझे उम्मीद थी कि आपके लोग भी उसे स्वीकार करेंगे. मगर लगता है कि मेरी बातों का RSS के लोगों पर कोई असर नहीं हुआ। उनके कार्यक्रमों (गतिविधियों) में भी किसी तरह का बदलाव नहीं आया। इस बात में कोई शक नहीं कि संघ ने हिंदु समाज की सेवा की है।  ऐसे इलाकों में जहां लोगों को मदद की जरूरत थी, किसी संगठन की जरूरत थी, वहां संघ के युवाओं ने महिलाओं और बच्चों की रक्षा की। कोई भी समझदार इंसान इसे लेकर आपत्ति नहीं जताएगा मगर आपत्तिजनक बात तब उठी जब वो बदले की भावना से भरकर मुसलमानों पर हमले करने लगे।  हिंदुओं को संगठित करना और उनकी मदद करना एक बात है। मगर हिंदुओं के साथ जो गलत हुआ, उन्हें जो तकलीफें झेलनी पड़ी, उसका बदला निर्दोषों-लाचारों और महिलाओं-बच्चों से लेना बिल्कुल अलग बात है।

इसके अलावा सभ्यता और शिष्टाचार के सारे तकाजे भुलाकर कांग्रेस के प्रति उनका विरोध, वो भी ऐसी डाह की भावना के साथ, इसने लोगों के बीच एक किस्म की अव्यवस्था पैदा की है।  उनके सारे भाषण सांप्रदायिक जहर से भरे थे. जहर फैलाना और हिंदुओं को अपनी रक्षा के लिए अति उत्साहित करना जरूरी नहीं था।  इसी जहर का नतीजा था कि देश को गांधी जी के अनमोल जीवन के बलिदान का दर्द झेलना पड़ा। अब न ही भारत सरकार और न ही देश के लोगों की एक इंच सहानुभूति भी संघ के साथ है। बल्कि संघ के प्रति विरोध बढ़ गया है. विरोध तब और बढ़ गया, जब गांधीजी की हत्या के बाद संघ के लोगों ने खुशी जताई. मिठाइयां बांटी। ऐसी स्थितियों में संघ पर कार्रवाई करना भारत सरकार के लिए अनिवार्य हो गया।"

इस बात को अब छह महीने बीत गये। हमें लगा था कि समय के साथ संघ के लोग सही रास्ते पर आ जाएंगे। लेकिन मेरे पास जैसी रिपोर्ट्स आई हैं, उनसे साफ पता लगता है कि संघ के लोग अपनी उन्हीं पुरानी गतिविधियों के अंदर नई जान फूंकने की कोशिशों में लगे हुए हैं। मैं आपसे फिर कहता हूं. जयपुर और लखनऊ में दिए गए मेरे भाषणों पर विचार कीजिए। मैंने RSS के लिए जो राह बताई थी, उसे स्वीकार कीजिए। मुझे यकीन है कि इसी में संघ और इस देश का भला है। इस राह में चलकर हम देश की बेहतरी के लिए हाथ मिला सकते हैं। आपको पता होगा कि हम नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। देश में ऊपर से लेकर नीचे तक, हर किसी की जिम्मेदारी है कि वो जैसे हो सके, वैसे इस देश की तरक्की में योगदान दे, देश की सेवा करे। ऐसे नाजुक वक्त में राजनैतिक विचारधारा या पार्टी संघर्ष और पुराने झगड़ों की कोई जगह नहीं है। मैं साफ कह चुका हूं कि संघ के लोग अगर कांग्रेस में शामिल हो जाते हैं, तो वो अपनी देशसेवा जारी रख सकते हैं।

संघ और बीजेपी ने नफरत की राह कभी नहीं छोड़ी। राष्ट्रवाद का हथियार लेकर सत्ता का कब्जा और अपने तथाकथित सिद्धांतों के अनुसार सत्ता संचालन उनके खून में दौड़ता रहा। बड़ी ही धूर्तता से RSS व BJP नेहरू-पटेल जैसे देश के साझा नायकों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करके पॉलिटिक्स कर रहे हैं।  इसीलिए इस इतिहास में इनके हिस्से का जो है, वो बताना जरूरी है। हिस्ट्री एक सत्याभिलेख की तरह होती है उसे कोई चाह कर भी बदल नहीं सकता। किसी भी मुल्क की असल ताकत उसकी आवाम और उस आवाम के भीतर पैदा हुए पारस्परिक सौहार्द होती है।