ऑक्सीजन : प्राण हो तुम

स्वयं के अस्तित्व पर इठला रही हो।

महत्व अपना सभी को बता रही हो।

जीवन का सार, प्राणदायिनी हो तुम, 

फिर क्यों रूठ कर दूर जा रही हो? 


तुम्हारे जाने से सपने टूट जाएंगे।

यहीं कहीं हमारे अपने छूट जाएंगे।

जीवन की आस और श्वास हो तुम,  

क्यों घरों के दीपक बुझा रही हो? 


तुम्हारी कमी करती है अनर्थ बड़ा।

सब सभ्पदा वैभव अब व्यर्थ पड़ा।

प्राणवायु! प्रकृति का वरदान हो तुम, 

क्यों सिलेंडरों में समाती जा रही हो? 


व्याकुल बाल-मन हेतु पालक हो तुम,  

व्यथित वृद्ध हृदयों की आलम्बक तुम,  

उमंग अविरल प्राण संचारक हो तुम 

क्यों प्राणावरोधक बनती जा रही हो? 


हर सिसकी, हर आँसू पूछता है सवाल। 

तुम थी ममतामयी, क्यों बन गयी काल ।

प्राणियों का प्राण, विश्वास हो तुम,  

फिर क्यों निष्ठुरता यूँ दिखा रही हो? 


करते हैं प्रण अब तुझे नहीं सताएंगे।

रखेंगे हरियाली, वृक्ष नित लगाएंगे। 

नादान मानव हैं हम, क्षमा दान दो।

इतने कठोर सबक क्यों सिखा रही हो? 

              •••

दीप्ति खुराना

शिक्षिका, मुरादाबाद (उ.प्र.)