कविता ऐ चाँद

ऐ चाँद

तू आज फिर

तन्हा-तन्हा

सा है,

रुका-रुका

सा है,

क्या तेरा दिल

किसी की

याद में

धड़का-धड़का

सा है,

क्या तेरी भी

एक तमन्ना है

जिसने तुझे

रुसवां किया है

लगता है

खफ़ा-खफ़ा

सा है

ख्वाब बुन के

तेरी तहरीर पर

वो कई

रुकी-रुकी सी है

और तू

खड़ा-खड़ा सा है

ऐ चाँद

आज फिर......।


गरिमा राकेश