अश्रु

दुःख को सहते भी है,सुख में बहते भी है,

अश्रु  दरिया  है  सागर  में मिलते  भी है।

कह  न पाए  जो हम,सह न पाए जो हम,

नयनों   के  रास्ते   वो   निकलते  भी  है।

मन का  धुंधला सा  शीशा  दरकता रहा।

घाव  अन्दर   ही   अन्दर  करकता  रहा।

टीस   उठती   रही  फिर   भटकती  रही,

तन में  फिरती  रही  मन में  घुलती  रही,

जब सहा  न  गया, अश्रु  बन  बह  गया।

बर्फ   सा   ठोस   पत्थर , कलेजे  पे  हो,

ऊष्मा   प्यार   की   जो   सहेजे   न  हो,

जो पिघलता  न  हो  और  गलता  न हो,

भार जिसका हृदय  तनिक सहता  न हो,

जब सहा  न गया  अश्रु  बन   बह  गया।

मन में बाधा है जो  शर  को साधा है जो,

पीड़ा   को  काट  दे   टुकड़ों  में  बांट दे,

विष  को  रहने  न  दे  व्याधि  बनने न दे,

अश्रु   है  वह   दवा   दर्द   जिससे  बहा,

नयनों   के  रास्ते  वो  निकलता  भी  है।

सीमा मिश्रा,वरिष्ठ गीतकार कवयित्री व 

शिक्षिका,स्वतंत्र लेखिका व स्तम्भकार, 

उ०प्रा०वि०-काजीखेड़ा,खजुहा,फतेहपुर-

उत्तर प्रदेश