तसल्ली

कुछ देर बात कर लो, मुझे तसल्ली मिल जाती है

जैसे बुझ रहे शोलों को फूँक से रवानी मिल जाती है

मेरे चेहरे की मुस्कुराहट पर ताला सा बन्द रहता है

तुम चाबी हो तो मुझे खुलने में आसानी मिल जाती है

इश्क सुई सा चुभता है मगर फिर यूँ सुकून मिलता है

जैसे काँटा निकलने पर पैर को जिंदगी मिल जाती है

तुम वो बादल हो जो बिन बरसे सहरा से गुज़र जाता है

पर तेरी वजह से कुछ पल धूप से आजादी मिल जाती है

तुम चिड़िया की तरह मेरे आँगन में सूरज फेंक जाती हो

तुम भोर में चहचहाती हो, रोजाना ताजगी मिल जाती है

ऐसे क्यों कहती हो कि मेरी हर गलती माफ कर दोगी

इस इनायत से मुझे गुनाह करने की तिश्नगी मिल जाती है

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अवतार सिंह, जयपुर

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