"परिवार यानि सुरक्षा कवच"

परिवार वह सामाजिक संस्था है जो हमारे जीवन के अच्छे बुरे समय में हमारे साथ होती है। जिसके हर कोने में अपनापन महसूस होता है। जहां होने से जन्नत का अहसास होता है। जिसको खोने के डर से ही हमारी रूह कांप जाती है। जहां रहने वाले सभी सदस्य खुद से पहले परिवार के विषय में सोचते हैं। अपने स्वार्थ से ऊपर परिवार की मर्यादा को स्थान देते हैं। अपनी इच्छाओं से ऊपर परिवार के हित को महत्व देते हैं। आज की भागती दौड़ती ज़िंदगी में ऐसी जगह का होना बस कल्पना ही है। परिवार चार अक्षरों का एक शब्द ही रह गया है। बहुत कम ऐसे खुशनसीब लोग हैं जिन्हें आज के जमाने में परिवार का प्यार और समर्पण मिल रहा है। स्वार्थ की आंधी ने मनुष्यता को तो समाप्त कर ही दिया है साथ ही परिवार के अस्तित्व पर भी प्रश्न चिन्ह अंकित कर दिया है।

आज जब सम्पूर्ण विश्व कोरोना के प्रकोप से त्रस्त है, परिवार ही वह घोंसला है जिसमे पनाह मिली हुई है। परिवार के सदस्य ही इस समय साथ में खड़े हुए हैं। परिवार ही वह जगह है जहां बैठकर सब अपना मुश्किल समय काट रहे हैं। समाज की छोटी इकाई परिवार को माना जाता है। जो व्यक्ति अपने परिवार के साथ खुश रह सकता है वह सामाजिक भी हो सकता है, देशभक्त भी और वैश्विक प्राणी भी। परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करने वाले समाज, देश और विश्व में अपनी जगह आसानी से बना लेते हैं। और इंसानियत की एक मिसाल बन जाते हैं। कोरोना के आने से पहले हम परिवार के महत्व को भूल गए थे। स्वार्थ की आंधी में बहते जा रहे थे। लेकिन अब फिर से यह सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि हमारी भौतिक प्रगति यह सुनिश्चित नहीं करती कि हम मुसीबत में नहीं फसेंगे। हमे किसी की आवश्यकता महसूस नहीं होगी। कोई हर हाल में हमें भावनात्मक और मानसिक संबल से परिपूर्ण रखेगा। ऐसा करने वाला और कोई नहीं अपना परिवार ही होता है। मुसीबत के समय हमे वहीं पर आसरा मिलता है। वही हमारे दुख कम कर सकता है। 

आधुनिक पीढ़ी जो सभी सुख सुविधाओं में जन्मी है, जिसने इंटरनेट की सहायता से पूरी दुनिया को जान लिया है लेकिन अपने परिवार के सदस्यों से अनजान है। अपने माता पिता के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना से अनभिज्ञ है। सोशल मीडिया पर दुख बांटना जानती है लेकिन परिवार के सदस्यों से बात करना नहीं जानती है। सामंजस्य जैसे शब्द जिनके लिए अर्थ हीन हैं। उन्हें सबक लेना चाहिए आज के दौर से कि जब भगवान ने भी अपना ताला नहीं खोला, जब चिकित्सक अपने कर्तव्य को भूले तब भी केवल परिवार हमारे साथ रहा और अब भी है। जीवन कब तक रहेगा कोई नहीं जानता है फिर क्यों इतना अहंकार ? भारतीयों को आंखें खोल कर अब घर की चारदीवारी को पहचान लेना चाहिए। उन बुजुर्गों को सम्मान देना चाहिए जिनके लिए वृद्धाश्रम बनते ही जा रहे हैं। उन बच्चों को गले से लगा लेना चाहिए जिन्हे छोटी सी गलती पर हम घर छोड़ने को बोल देते हैं। परिवार के सदस्य एक कभी ना टूटने वाले संबंध में बंध जाएं। ना बंदिशें हो, ना ही बेशर्मी। बस प्यार और सम्मान पर सभी का हक हो। लड़ने को तो बहुत मिल जायेंगे। एक अदृश्य जीव ने हमें ललकारा हुआ है। आवश्यकता है मिलकर खड़े होने की। एक सुखद कल्पना के साथ सभी को विश्व परिवार दिवस की शुभकामनाएं।

अर्चना त्यागी

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