॥ जीवन के दो पल ॥

जीवन क्या है इक झरना है

गिरना उठना बह जाना है

सुख दुःख दो किनारे से मिल कर

आगे बस बढ़ते जाना है


ना रहा है जग में कोई स्थाई

ना मिला जीवन में चैन यहाँ

हर दिन रोना और हैंसना है

ना मिला है कभी सकून यहाँ


तेरा सफर कुछ पल का है

मंजिल है मुक्तिधाम जहाँ

कुछ स्थाईत्व ना रहा जग में

जीवन का नाम गुमनाम यहाँ


पथ काँटो से है भरा पड़ा

सत्य मार्ग कठिन है इक सफर

जीवन लहू लुहान हो रोता

गम का दर्द है जीवन डगर


जो आया है वो निश्चय ही जायेगा

माँ के गर्भ से जो अवतरण हुआ

जग रंगमंच सा सजा है यहाँ

अभिनय पश्चात पर्दा गिर जायेगा


जीवन कभी ठहरा नहीं जग में

राजा हो या वो रंक सभी

हर आने वाला यहाँ से रूखसत होगा

सिकन्दर हो या हो और कोई


ना राजा ठहरा ना प्रजा यहाँ

ना सम्राठ ठहरा ना साम्राज्य जहाँ

जब साँस तन से रूठ जाती है

दिल की धड़कन भी ठहर जाती है


जीवन पानी की बुलबुले के समान

जीवन अधुरे का है अरमान

जीवन सरिता की रवानी है

चार पल की ये जिन्दगानी है


जीवन का रंग पल पल बदले

कभी जाड़ा कभी बरसात तले

मौसम की तरह ये बदलता है

कभी हँसाता है कभी रूलाता है


हर कोई यहाँ अभिनेता है

निर्देशन उपर वाला ही देता है

अनजान डगर ईशारे की असर

मंजिल कब्रिस्तान तक जाता है


जीवन पानी के बुलबुले जैसा

सतह पर आ फट जाता है

जग का रूप धर्मशाला जैसा

कुछ पल ठहर वापस लौट जाता है


क्यूं करते हो अभिमान सारे

कुछ साथ ना जायेगा तेरे

सब कुछ छोड़ चले जाना है

मुक्तिधाम आखरी ठिकाना है।


उदय किशोर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार

9546115088