चुपके चुपके

अपने दिल से पूछा मैंने, उसे कैसे याद करता है

दिल बताता ही नहीं, चुपके चुपके याद करता है


सरकते बादल की धुन, चाँद की आहट को चुन

खुद ही गुनगुनाता है, गीत सुनके याद करता है


मोहब्बत की रवायात को यूँ शिद्दत से निभाता है

धड़कता भी बाद में है, उसे पहले याद करता है


दिल के खजाने में दिलकश तस्वीरों का हुजूम है

पर उसके चेहरे को ही ज्यादा सबसे याद करता है


फुरकत में हर एक लम्हा रफ्ता रफ्ता गुजरता है

ये जानता है दिल, उसे किफायत से याद करता है


अब तरस आने लगा है, मुझे मेरे ही दिल पर कि

बस अब बहुत हुआ, कितना रोते रोते याद करता है

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✍️ अवतार सिंह, जयपुर