"लव आजकल"


उफ्फ़ वो भी एक ज़माना था छुपते- छुपाते चुप-चुपके लड़की सहेली के घर का बहाना बनाते माँ से झूठ बोलकर प्रेमी से मिलने निकलती थी और लड़का साइकिल पर सवार होते सिटी बजाते काॅलर चढ़ाकर गलियों की ख़ाक़ छानते चक्कर लगाता था। या सखियों से घिरी प्रेमिका को इशारे से बुलाता और बातों में उलझाकर सखियों को मिलने चली आती थी प्रेमिका। उस हसीन मुलाकात के बाद मानों जंग जीत ली हो वो वाला एहसास आता था।

वो भी रोमांस की रोमांचक परिभाषा थी। प्यार में एक तहेज़ीब थी, हया थी, दूरी थी साठ से सत्तर के दशक की फिल्मों में जो रोमांस दर्शाया जाता था एक से बढ़कर एक गीतों के माध्यम से वो एहसास उस ज़माने के लड़के लड़की खुद अपने अंदर जीते थे। लबों से लब नहीं फूलों से फूल को गले लगाते प्रेम को दर्शाया जाता था।

आजकल के युवाओं के लिए ये चोंचले आउटडेटेड और पुराने ज़माने की बकवास बातें है। अब तो सरेआम बाग में, पार्क में, या थियेटर में प्रदर्शित होता है। प्रेम वही है बस समय के चलते अभिव्यक्ति के तरीके बदलते रहते है। उस ज़माने में प्रेम अद्भुत स्पंदनों से भरा एहसास था जिसमें दर्द, विरह, प्रेम के लिए खुद को कुर्बान करने की प्रबल भावना रहती थी।

और शादी की रस्म सिर्फ़ रस्म नहीं एक एसा बंधन और कमिटमेन्ट माना जाता था की दांपत्य जीवन में दो व्यक्ति पसंद- नापसंद के बीच भी सालों बिना कोई शिकायत के भी निभा लेते थे। उसके पीछे समाज का भय या प्रतिष्ठा मायने नहीं रखते थे, पर आपसी समझ और सामाजिक ज़िम्मेदारी मायने रखती थी। दो परिवारों को या दो आत्माओं को सात जन्मों तक जोड़ने वाला सेतु माना जाता था शादी को। पर आजकल की पीढ़ी के लिए प्रेम और शादी मानों खेल बन गया है। प्रेम हुआ, कुछ दिन चला और छोटी सी बात पर पूर्ण विराम। चौथे दिन किसी दूसरे के साथ आँख लड़ते ही वापस प्यार होता है। और डिजिटल ऑनलाइन वाला प्यार जो हल्की सी शिकायत पर अनफ्रेंड और ब्लोक मारकर प्यार की हत्या कर दी जाती है।

और शादी से तो आजकल के बच्चे डरते या भागते है। मानों कमिटमेन्ट फ़ोबिया घर कर गया हो। युवाओं को लगता है शादी स्वतंत्रता छीन लेती है। करियर का धी एंड होता है। लड़के तो लड़के लड़कीयाँ भी करियर ऑरिएन्टेड होते 28/30 साल तक शादी को टालती रहती है। और एसे में आजकल के युवा लड़के-लड़कीयाँ होर्मोनल जरूरतों को पूरा करने के लिए लिव इन रिलेशनशिप जैसे रास्ते अपनाकर खुद को खुश कर लेते है। पैसा, करियर और महत्वकांक्षा को ज़िंदगी के पहले पायदान पर रखकर भावनाओं को परे रख देते है।

अच्छी नौकरी, खुद का घर, एक गाड़ी, पार्टियाँ, ब्रांडेड चीज़ें, लक्ज़री लाइफ़ स्टाइल बस ज़िंदगी सेटल हो गई। इन सारी चीज़ों को पाने के चक्कर में शादी परिवार, समाज जैसी खास जरूरतों से दूर होता जा रहा है।

टीवी और फिल्मी दुनिया में ये सब आम बात है। कई बार मिसमैच तार जुड़ जाते है बाद में अलग हो जाते है और यही कथित प्रेमी प्रेमिका कहीं मिल जाने पर एक दूसरे को अपने नये प्रेमी से मिलवाते भी है। लग्नेत्तर संबंध हो या लिव इन रिलेशनशिप आजकल की पीढ़ी के लिए ज़िंदगी एक सुहाना सफ़र है। जहाँ मन और दिल को आनंद मिलता है वो सब करने में कोई छोछ नहीं। परिवर्तन ज़िंदगी का नियम सही पर संस्कृति और संस्कारों की बलि चढ़ाकर नयापन अपनाना बुद्धिगम्य बात नहीं। प्रेम महसूस करने की, निभाने की और एक दूसरे की भावनाओं की कद्र करनेका नाम है नहीं की कोई खेल।

(भावना ठाकर,बेंगुलूरु) #भावु