इश्क का फितूर

हुस्न का गुरूर और इश्क का फितूर

एक दिन उतर ही जाता है।


माशूका की डोली सजी इधर आशिक की 

अर्थी उठी।

इश्क का बुखार ऐसे में अक्सर जल्दी

उतर जाता है।


वह डोली में जा रहे हैं ।आशिक मियां

भी कंधों पर जा रहे हैं।

जब आशिक का जनाजा उनकी गली से 

घूम कर निकला । बड़ी धूम से निकला।


आशिक की आह 

तेरी राह के कांटों को मैंने चुन- चुन कर

 यहीं से हटाया था।और तेरे हुस्न के गुरूर

नें मेरी मोहब्बत को इसी राह पर ठुकराया था। 


इस कदर उन्होंने जलवा- ए हुस्न बनाया था। 

शहर की हर गली से आशिकों का हुज़ूम

 निकल आया था।


उनकी आशिकी के चर्चे भी बड़े आम थे।।

बस हमीं नहीं ना जाने कितने उनके खास थे।

कितने उनके खास थे।


श्रीमती रमा निगम 

वरिष्ठ साहित्यकार भोपाल म.प्र. 

nigam.ramanigam@gmail.com