"उदारता की प्रतिमूर्ति"

 नर्से आंखों में उदारता की सेवा भाव लिये, प्रखर प्रकाश पुंज का सेवासंकल्प लिये मरीजों की सेवा के उत्तरदायित्व का निर्वहन तत्परता से करती है। हर आंखों से आंसू पोछने वाली ,अपने हुनर, तजुर्बा, प्यार दुलार तत्परता के साथ मरीजों की सेवा करती है। नर्सों के अंतर्मन का संकल्प सदैव रहता है कि ना तो कहीं  मृत्यु हो, ना शोक हो ,ना विलाप हो,ना पीड़ा हो ,ना कहीं करुणा हो। नर्स शब्द से सेवा भाव की क्रियाशीलता झलकती है जो अपने कर्तव्य के प्रति सच्ची निष्ठा का आत्मविश्वास लिए मरीजों का पूरे मनोयोग के साथ सेवा करती हैं। काम के प्रति ईमानदारी कर्तव्य के प्रति निष्ठा का मापदंड लिए नर्से अपनी सेवाएं तत्परता के साथ दुनिया के प्रत्येक अस्पतालों में मुहैया कराती हैं।  नर्सिंग की संस्थापक फ्लोरेंस नाइटेंगल ने तो क्रीमिया युद्ध के बाद घायल सैनिकों की इतनी तत्परता के साथ सेवा किया कि उन्हीं के जन्मदिवस पर विश्व नर्सिंग दिवस मनाया जाने लगा। मरीज को ठीक करने में जो भूमिका एक डॉक्टर की होती है वही भूमिका एक नर्स की होती है।  मरीज की सेवा नर्स की सबसे बड़ी पूंजी होती है। जन्म से लेकर मृत्यु तक नर्से मरीज के वाह्य जख्मों पर ही नहीं बल्कि अंदरूनी जख्मों पर मरहम लगाती हैं। रोगी के लिए नर्स एक मांँ की भूमिका में होती है जो सदैव रोगी के साथ अपनापन का व्यवहार निभाती है। उनका स्वभाव सदैव मित्रता पूर्ण होता है जो मरीजों का हमदर्द होने के साथ-साथ एक सहनशील नारी के रूप में दिखाई पड़ता है। आज वर्तमान समय में महामारी के संकट के समुंदर में डूबी दुनिया से उबारने का कार्य नर्से ही संपूर्ण वैश्विक दुनिया में कर रही हैं। वर्तमान युग में अब फ्लोरेंस नाइटिंगेल के जमाने की नर्सिंग का जमाना नहीं रहा गया है वर्तमान युग में नर्सों को सामने नई-नई चुनौतियां का सामना करना पड़ रहा है। नर्सों की सबसे बड़ी समस्या उनके काम में कभी-कभी हिंसा का शिकार होना भी पड़ता है, तीरमदार के दुर्व्यवहार का भी शिकार उन्हें होना पड़ता है, अस्पतालों में सबसे ज्यादा उत्तरदायित्व नर्सों का ही रहता है । वर्तमान युग में अस्पतालों में नर्स ही पहरेदार की भूमिका में है। स्टाकमैन  अखबार के मुताबिक दुनिया भर में निजी अस्पतालों में कार्य करने वाली नर्स है नर्सिंग के अलावा दूसरी नौकरी भी करती हैं क्योंकि उन्हें इतनी तनख्वाह नहीं मिल पाती जिससे उनकी पारिवारिक जरूरतें पूरी हो सके। उनके माथे पर चिंता की रेखाएं, उदासी, जिंदगी की घुटन, उनके बुलंद हौसले को पस्त कर देती हैं। निजी अस्पताल तो नर्सों से क्षमता अनुसार एक कार्य लेते हैं परंतु आवश्यकता अनुसार पारितोषिक नहीं देते हैं। नर्सों के पास समस्याओं का अंबार तो लगा हुआ है, परंतु उनका समाधान निश्चित नहीं हुआ है। जिंदगी की आखिरी घड़ियां गिनने वाले मरीजों का कड़वा अनुभव नर्सों के ही पास होता है। चिकित्सा की नई-नई तकनीकीयों के चुनौतियों का सामना नर्से कर रही हैं फिर भी मरीजों के साथ मित्रता का तटबंध लिए सदैव सेवा के लिए तत्पर रहती हैं।

स्वतंत्र स्तंभकार

सत्य प्रकाश सिंह केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयागराज उत्तर प्रदेश