भोपाल में मिले ब्लैक फंगस के 20 नए मामले, हमीदिया अस्पताल में 30 बेड का नया वार्ड शुरू

 भोपाल: एक तरफ पूरा देश पहले ही कोरोना वायरस से फैली महामारी से जूझ रहा है और अब लोग ब्लैक फंगस नामक फंगल इंफेक्शन की जद में भी आने लगे हैं। कोरोना से ठीक हो चुके मरीजों में एक खास तरीके का फंगल इंफेक्शन देखा जा रहा है। यह नाक के रास्ते मस्तिष्क तक पहुंच जाता है। कई मामलों में तो इसे ठीक करने के लिए डॉक्टरों को मरीजों की आंख तक निकालनी पड़ रही है। भारत के कई राज्यों में ब्लैक फंगस के मामले दर्ज किए गए हैं। इसमें एक मध्यप्रदेश भी है, जहां कि राजधानी भोपाल में रविवार (16 मई) को ब्लैक फंगस के 20 और मरीज मिले। रोजोना इस फंगल इंफेक्शन के मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए रविवार को हमीदिया अस्पताल में 30 बेड का नया वार्ड शुरू कर दिया गया है।

भोपाल में 100 से ज्यादा मरीज भर्ती

भोपाल के अलग-अलग अस्पतालों में अब तक ब्लैक फंगस के 100 से ज्यादा मरीज भर्ती किए जा चुके हैं। डॉक्टरों को इनमें से आठ मरीजों की सर्जरी करनी पड़ी। गांधी मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. जितेंद्र शुक्ला ने बताया कि हमीदिया में ब्लैक फंगस के 34 मरीज भर्ती हैं। इनमें 31 रैफर होकर आए हैं। वहीं, होशंगाबाद रोड के एक निजी अस्पताल में रीवा की एक डॉक्टर का भी इलाज चल रहा है।

ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (एम्स) के डायरेक्टर डॉ. सरमन सिंह ने बताया कि अस्पताल में भर्ती होकर कोरोना का इलाज कराने वाले मरीजों की अपेक्षा होम आइसोलेशन में स्टेरॉयड दवाएं लेकर ठीक हुए मरीजों को ब्लैक फंगल के संक्रमण का खतरा ज्यादा है। इसकी वजह अस्पताल की अपेक्षा लोगों के घरों में फंगस और पर्यावरण में फंगस के जीवाणु की मौजूदगी ज्यादा होना है। 

ब्लैक फंगस को समझें 

अमेरिका के सीडीसी के मुताबिक, म्यूकोरमाइकोसिस या ब्लैक फंगस एक दुर्लभ फंगल इंफेक्शन है। यह एक गंभीर इंफेक्शन भी है, जो मोल्ड्स या फंगी के एक समूह की वजह से होता है। ये मोल्ड्स पूरे पर्यावरण में जीवित रहते हैं। ये साइनस या फेफड़ों को प्रभावित करते हैं। वहीं डॉ. सिंह ने कहा कि म्यूकोरमाइकोसिस नाम के फंगाइल से होने वाला यह फंगल डिजीज ज्यादातर उन लोगों को होता है, जिन्हें पहले से कोई बीमारी हो या वो ऐसी मेडिसिन ले रहे हों जो इम्यूनिटी को कम करती हो या शरीर के दूसरी बीमारियों से लड़ने की ताकत कम करती हो। ये उन लोगों को होता है जो डायबिटिक हैं या जिन्हें कैंसर है, जिनका ऑर्गन ट्रांसप्लांट हुआ हो, जो लंबे समय से स्टेरॉयड का सेवन कर रहे हों, जिन्हें कोई स्किन इंजरी हो, प्रिमेच्योर बेबी को भी ये हो सकता है। 

इसके लक्षण क्या हैं?

एम्स के डायरेक्टर डॉ. सरमन सिंह ने बताया कि शरीर के जिस हिस्से में इंफेक्शन है, उस पर इस बीमारी के लक्षण निर्भर करते हैं। चेहरे का एक तरफ से सूज जाना, सिरदर्द होना, नाक बंद होना, उल्टी आना, बुखार आना, चेस्ट पेन होना, साइनस कंजेशन, मुंह के ऊपरी हिस्से या नाक में काले घाव होना, जो बहुत ही तेजी से गंभीर हो जाते हैं। तेज सरदर्द और आंखों में लालपन इसके दो सामान्य लक्षण हैं। 

इसके लक्षण कब सामने आते हैं?

कोरोना वायरस से ठीक होने के दो-तीन दिन बाद म्यूकोरमाइकोसिस या ब्लैक फंगस के लक्षण दिखाई देते हैं। कोरोना से ठीक होने के दो-तीन दिन बाद पहले ये संक्रमण साइनस में दिखता है और उसके बाद आंख तक जाता है। वहीं अगले 24 घंटे में ये फंगस दिमाग तक हावी हो सकता है।  

शरीर में कैसे पहुंचता है ब्लैक फंगस?

ज्यादातर सांस के जरिये वातावरण में मौजूद फंगस हमारे शरीर में पहुंचते हैं। अगर शरीर में किसी तरह का घाव है या शरीर कहीं जल गया है तो वहां से भी ये इंफेक्शन शरीर में फैल सकता है। अगर इसे शुरुआती दौर में ही डिटेक्ट नहीं किया जाता है तो आखों की रोशनी जा सकती है या फिर शरीर के जिस हिस्से में ये फंगस फैले हैं, वो हिस्सा सड़ सकता है।   

ब्लैक फंगस कहां पाया जाता है ?

ये फंगस वातावरण में कहीं भी रह सकता है, खासतौर पर जमीन और सड़ने वाले ऑर्गेनिक मैटर्स में। जैसे पत्तियों, सड़ी लकड़ियों और कम्पोस्ट खाद में यह पाया जाता है।   

कितना खतरनाक है ये इंफेक्शन?

डॉ. सरमन सिंह ने बताया कि ये फंगस एक से दूसरे मरीज में नहीं फैलता है, इसलिए इसके मरीज को नॉन कोविड वार्ड में भर्ती किया जा सकता है लेकिन ये कितना खतरनाक है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसके 54 फीसद मरीजों की मौत हो जाती है। यह फंगस जिस एरिया में डेवलप होता है, उसे खत्म कर देता है। समय पर इलाज होने पर इससे बच सकते हैं।