नव संवत्सर के दोहे

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 


नवल वर्ष में झूमता,सारा भारतवर्ष।

काल नया सुखकर लगे,पोषित हो अब हर्ष।।


नव संवत्सर आ गया,लेकर नव अरमान।

यही कामना ज़ल्द हो,कोविड का अवसान।।


यही हमारा वर्ष नव,यही हमारी आन।

नव संवत्सर शुभ रहे,गूँजे मंगलगान।।


हर दिल में उत्साह है,हर दिल पले उमंग।

नव संवत्सर ने रचे,खुशियों के नव रंग।।


संवत् नव गाने लगा,चैत्र माह के गीत।

आओ,हम संघर्ष को,लें मिलकर के जीत।।


विक्रम संवत् मान है,गौरवमय पहचान।

जो देती हर आर्य को,नवल एक मुस्कान।।


उज्जयिनी के राज ने,दिया हमें वरदान।

नौ रत्नों के संग में,संवत् का यशगान।।


शुभ-मंगल का हो गया,देखो ख़ूब विधान।

नव संवत्सर दे रहा,भारत का उत्थान।।


ज्योतिष,दर्शन,व्याकरण,तर्क,चिकित्सा ज्ञान।

विक्रमयुग ने कर दिया,परे सकल अज्ञान।।


नव संवत्सर है प्रखर,जिसमें है विज्ञान।

बनकर के जो सूर्य-सा,करे तिमिर-अवसान।।


नव संवत्सर का करो,अभिनंदन कर जोड़।

देगा जो अब काल को,निश्चित ही नव मोड़।।

                         

--प्रो(डॉ)शरद नारायण खरे

            प्राचार्य

शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय

मंडला,मप्र -481661

(मो.9425484382)