ये साजिशें हैं ,फ़क़त कुर्सी के चंद भूकों की

फिज़ाओं में तुम ज़हर,

क्यों घोलते हो ? 

मासूम बेगुनाहों का सर ,

क्यों फोड़ते हो ?

क्या राम ने कहा या हिदायत,

है खुदा की ,

शैतानियत का लबादा क्यों ,

ओढ़ते हो ? 

मंदिर - मस्जिद में उलझने ,

वालों ,खाकर कसम , 

कहो क्या हर वक्त खुदा और

राम को तुम पूजते हो ?

ये साजिशे हैं फ़क़त, कुर्सी के,

चंद भूखों की , 

इक जरा सी है बात तुम क्यों ,

नहीं सोचते हो ? 

एक जगह आग लगाकर के,

एक नादानों ,

तमाम , मुल्क को शोलों में ,

क्यों झोंकते हो ? 

कौन हिन्दू और कौन मुस्लिम,

है यहां पर , मुश्ताक ,

प्यारे बापू के अरमानों को इस ,तरह,

क्यों रौंदते हो ? 

डॉ . एमए शाह ,"सहज़"

मगरधा हरदा  मध्यप्रदेश