महफ़िल थी तेरी मुश्ताक़ ,,,,,,

आंखों में रहे अश्क़ जज़्बात

ने रुकने न दिया,
बात थी मेरी ज़ुबाँ पर ,लबों 
ने हिलने न दिया,
बस इक लम्हा तुझसे मिलने 
की तमन्ना थी।
न जाने  क्यों तूने  वो मौक़ा 
मुझ्को न दिया,
लोग कहते हैं कि रब सुनता
है मुरादें दिल की,
कौन था  दुआओं को रब से
मिलने न दिया,
मज़बूरिये हालात थे,इल्ज़ाम
ये सर पे आया,
दिल तो दिल था, धड़का, मुझे
रोने न दिया,
एक दर्द होता तो ये सदमा  
हम भी सह जाते,
अरमाने दिल हज़ारों थे तुने 
महकने न दिया,
पी करके आँखों से मैं भी 
मदहोश हो जाता,
महफ़िल थी तेरी मुश्ताक़ 
तूने बहकने न दिया,

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
"सहज़"
मध्यप्रदेश,,,,,,,,,