मेरा मन

मन के भावों को मैं पन्नों  पे सजा लेती हूॅ,

तुमसे कहना  है लेखनी  मै  उठा  लेती हूॅ।

तुमसे मिलने को मन ये  जब भी करता है, 

यादों के समंदर से  मोती में  चुरा  लेती हूँ।

कुछ अधूरी सी  रह  गई  जो  बातें  तुमसे, 

ख्वाब ही सही महफिल को सजा लेती हूँ।

जब संवरती  हूॅ  सोच  कर आईने  में तुझे,

तेरी   यादों  फूल  जुड़े  में  लगा  लेती  हूं।

तेरा हर गीत सजा  रहता  है  होठों  पे मेरे,

मेरा मन चाहे जब खुद को मैं सुना लेतीहूं।

मेरे मन  को  नहीं  भाती  हैं  दूरियाॅ तुमसे,

तुम हो बेशक खफा खुद को मना लेतीहूँ।

मन  जब  भी  घिरे गम के काले बादल में,

तेरी चाहत का दिया पल में जला लेती हूॅ।

मन के भावों को  मैं पन्नों पे सजा लेती हूँ, 

तुमसे  कहना है  लेखनी में उठा  लेती हूँ।

मोहिनी गुप्ता,हैदराबाद-तेलंगाना

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