कोरोना की दूसरी लहर और राज्यों की बदलती भूमिकाएं

कोरोना संक्रमण की तेज रफ्तार से देश में एक बार फिर अफरातफरी मच गई है। अनेक राज्यों में कहीं आंशिक एवं कहीं पूर्णबंदी के रूप में अलग-अलग तरीकों से लॉकडाउन लगने शुरू हो गए हैं।  इस वक्त मुख्य सवाल यही है कि इस तरह की स्थिति दोबारा निर्मित होने के लिए जवाबदेह कौन है? सरकार और आमजन में से अधिक लापरवाही किसकी है? क्या इस तरह की स्थितियों की पुनरावृत्ति को राज्य सरकारों की प्रशासनिक अक्षमता मानी जानी चाहिए? बहरहाल सरकारों के लिए सवाल एवं मुश्किलें दोनों मुसीबत खड़ा करते दिख रहे हैं। 

कोरोना संक्रमण के नये वेरियेंट या नई म्युटेंट पिछली बार की तुलना में अधिक घातक एवं खतरनाक बताए जा रहे हैं। इस बार कोरोना के लक्षण कुछ अलग तरह के हैं, और कई-कई दिनों तक इसका पता ही नहीं चल पा रहा है। इसलिए इस बार सरकारों के लिए चिंताएं एवं चुनौतियां अलग तरह की हैं। जाहिर है कि इस बार राज्य सरकारों को कोरोना संक्रमण से अलग तरह से अलग तरीके सेे जूझना है और इससे उबरने एवं निपटने के लिए उपाय भी नये तरीके से करना है। 

इस बार की पहली चिंता एवं चुनौती यह है कि कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर की तेजी से बढ़ती संक्रमण दर को कैसे रोका जाए। दूसरी चिंता टीकाकरण की दर को कैसे बढ़ाया जाए। जिस गति एवं रफ्तार से दूसरी लहर का संक्रमण फैल रहा है, उसे अब लॉकडाउन जैसे उपायों से रोकना असंभव तो है ही, साथ ही साथ अब यह व्यावहारिक भी नहीं है। अर्थव्यवस्था पहले से ही खराब चल रही है। जीएसटी संग्रहण पहले से ही बहुत कम हो रहे हैं। स्थितियां तेजी से सुधरती दिख रहीं थीं, मगर दूसरी लहर से सारे सकारात्मक नतीजों के उल्टे पड़ने की आशंकाएं बढ़ती दिख रही हैं। 

अर्थव्यवस्था को सुधारने और विकास दर की गिरावट को रोकने जैसे उपायों पर छत्तीसगढ़ सहित कई राज्य सरकारों ने  सराहनीय काम किया जिसका नतीजा यह निकला है कि उद्योग-धंधे एवं कारोबार को गति मिली है। रोजगार के अवसर लगातार बढ़ रहे हैं । बाजार की स्थितियों में सुधार हुआ है।  कुल मिलाकर एक साल बाद स्थितियां काबू में आ गई थीं। लेकिन अब सारे प्रयासों पर पानी फिरता दिख रहा है और महाराष्ट्र सहित कुछेक राज्यों में तो स्थितियां बेकाबू होती दिखने लगीं हैं। यदि यह स्थिति फिर पहले जैसे हो गई तो इस बार कारोबार, उद्योग-धंधों एवं अर्थव्यवस्थाओं को संभालना बहुत कठिन हो सकता है। 

विकासदर की चिंता तो छोड़िये, रोजगार की स्थिति ही विकराल हो सकती है। अर्थव्यवस्था लंबी अवधि के लिए सुस्ती एवं मंदी की चपेट में आ सकती है। महंगाई बेकाबू होकर मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बहुत बड़ा संकट खड़ा कर सकता है। इस समय कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर की तेजी से बढ़ती संक्रमण दर से बचने एवं इसकी आसन्न चुनौतियों से निपटने के लिए राज्य सरकारों को अपनी कामकाज की शैलियों में सुधार करने की सख्त जरूरत है। कोरोना की वजह से राजस्व एवं संसाधनों पर आई गिरावट को राज्य सरकारों ने नजरंदाज करते हुए अपने खर्चों में अपेक्षित कटौती नहीं की, जितनी उन्हें की जानी चाहिए थी। 

केन्द्र सरकार लगातार रक्षा खर्चों, निर्माण कार्यों पर होने वाले को बढ़ाती जा रही है, जिसकी इस समय उपयोगिता उतनी नहीं है जितनी सरकार समझ रही है। पूरी दुनिया कोविड-19 संकट से जूझ रही है, मगर हमारी सरकार लगातार राफेल विमानों की खरीदी पर भारी-भरकम बजट खर्च करने में लगी है। संसद भवन अभी सालों तक काम आ सकता है, उस पर भारी खर्च करने को अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना चुकी है। शिक्षा, महंगाई, रोजगार जैसे जन उपयोगी मसलों पर केन्द्र सरकार चुप्पी साधकर अनेक गैर-जरूरी मसलों पर राजस्व एवं संसाधनों की बर्बादी  पर रोक लगाने में नाकाम दिखती है। 

इस समय  केन्द्र सहित सभी राज्य सरकारों को फिजूलखर्ची पर लगाम लगाने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है। सबसे बड़ी जरूरत है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई भर्तियों को तत्काल प्रभाव से अंजाम दिया जाए। शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए उपाय करने की जरूरत है। बदलते वक्त में सरकारों को अपनी कार्यशैली में बदलाव करने की जरूरत है जिससे कोरोना से निपटने एवं उबरने में सहूलियत हो। टीकाकरण बढ़ाने के साथ लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाना होगा। 

जब तक लोग स्वयं अपने स्वास्थ्य के लिए जागरूक नहीं होंगे, तब तक सरकारों के सारे उपाय नाकाम ही सिद्ध एवं साबित होंगे। इसलिए जनचेतना, जनशिक्षा एवं जनजागरूकता बढ़ाना सबसे सकारात्मक, महत्वपूर्णं एवं सार्थक उपाय होगा। भारत इस बार पिछली पीक को पार कर चुका है, और आनेवाले कई सप्ताह तक इसके तेजी से बढ़ने एवं फैलने की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। 

लिहाजा सरकारों के साथ लोगों को भी अत्यधिक सावधान एवं सतर्क रहने की जरूरत है। कोरोना संक्रमण की दूसरी बढ़ती लहर से बचने एवं इसकी आसन्न चुनौतियों से निपटने एवं उबरने के साथ-साथ आम जनमानस की मानसिकता में बदलाव एवं परिवर्तन लाना अधिक जरूरी है। व्यक्तिगत सावधानियां, साफ-सफाई, सतर्कता एवं व्यक्तिगत चेतना ही स्वास्थ्य की कुंजी होती है, यह बात आमजन को समझने एवं समझाने की जरूरत है।