॥ हमने देखा है ॥

बरसात की काली अंधेरी रात में

चुल्हे को सिसकते हमने देखा है

रोटी के आभाव में रोते बिलखते

मासुम को भी हमने देखा है


झोपड़ी तोड़कर महल को बनते

जग की ऑखों ने अक्सर देखा है

झोपड़ी के दिल की दर्द को टीसते

हमने आँखों से देखा है


खेतों में पसीना बहाते अन्न उपजाते

अन्नदाता की मिहनत को देखा है

कर्ज तले घुट घुट कर रोते हुए

गाँव के किसान को मरते देखा है


सरकारी स्कूल में खिचड़ी खाते और पढ़ते

सरकारी व्यवस्था को सबने देखा है

सरकारी स्कूल के गुरूजी के बच्ये को हमने

मंहगे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते देखा है


बरसात में भीगते रात गुजारते

गरीब भिक्षुक को कल्पते देखा है

भूखा को डाँटते और दत्कारते 

अमीरों को हमने देखा है


गरीब लाचार को उपहास का पात्र बनते 

गुदड़ी में जीवन यापन करते हमने देखा है

बेवकूफी का तमगा पहनते मजाक बनते

हम सब की ऑंखो ने देखा है


इन्सानियत को मरते मक्कारी को हॅसते

इस जग वाले ने देखा है

मानवता को रोते शर्मसार होते

मेरी इन आँखों ने देखा है ।


उदय किशोर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार

9546115088