बुजुर्गों का सम्मान करो...!

देखा न कभी हवाओ को है,

       अनुभव से आभास करो। 

चरणों में स्वर्ग बसते जिनके,

        आंखों में रब को पास करो।

   छाया जिनके सर पर है,

          किस्मत को धनवान करो।

कुछ संस्कार बचा कर रखो,

          बुजुर्गों का सम्मान करो।

अधिकार किसको क्या मिला,

            समभाव से विचार करो।

कोई छोटा न कोई बड़ा,

        न किसी का अपमान करो।

संस्कार कही मिला विरासत,

         सहजभाव शिरोधार्य करो।

कुछ संस्कार बचा कर रखो,

          बुजुर्गों का सम्मान करो।

तजुर्बा एक हिस्सा जीवन का,

        बातों का कुछ पालन करो।

माना वक्त बदलते रहते,

         पराया न अपनो को करो।

देव तुल्य जनमानस जग में,

       उनका कीर्ति गुणगान करो।

जो थे तपीस ब्रज साहसी,

          बुजुर्गों का सम्मान करो।

न लौट आता एक बार जो जाता,

       बीते लम्हे ज़रा याद तो करो।

ओ जो सुहावने पल आंखों का,

      छाया हृदय से बात करो।

रूठ गये कुछ यादे मन से,

      फरियाद सौ सौ बार करो।

क्या अपने या क्या पराये,

        बुजुर्गों का सम्मान करो।

रीत सदा जो मन को भाये,

        गुण ऐसा विद्यमान करो।

घर मंदिर की गलियों में, 

          बुजुर्गों को महान करो।

जान है तो जहान है,

          शब्द चाहे आम करो।

इंसा की संवेदना जगाकर,

          इंसानियत का काम करो।

कुछ संस्कार बचा कर रखो,

          बुजुर्गों का सम्मान करो।


                 दिव्यानंद पटेल

                 विद्युत नगर दर्री

                 कोरबा छत्तीसगढ़