प्रेम करे सब कोय

 

प्रेम तो करें सब कोय, 

पर तुलसीदास न होएं ।

पत्नी थीं प्रिय रत्नाबली, 

प्रेम पत्नी से अन्धो होय ।

न अंतर रस्सी व  सांप में, 

मुर्दा को जो नाव समझे ।

नाव समझ नदी पार करें, 

पत्नी ने वे बड़े ही  लताड़े ।

तुलसीदास भक्त हुए राम, 

कृपा तुलसी पर बड़ी महान ।

रामायण रच दीनी तुलसी ने, 

भये तुलसी महाकवि जग में ।

प्रेम करना तो भावनात्मक है, 

प्रेम अंध होना नकारात्मक है ।

व्यक्ति व वस्तु हो चाहे आदत, 

सब सीमा मे रहे तो ही बेहतर ।

नहीं तो हानि उठानी पड़ती है, 

अंधता न सुधरे ऐसी गलती है ।

कबीर कहा बुरा न मानो तुम, 

अति का कुछ  न भलो होय ।

तुलसीदास जी ने सिखा दिया, 

परित्याग करो तुम अति का ।

पूनम पाठक बदायूँ