वहाँ तो एक सा बिस्तर रहेगा

जहाँ पर लोभ है खंजर रहेगा।

जहाँ अभिमान है लश्कर रहेगा।

मेरा यकीन है बतला रहा हूँ,

जहाँ है आस्था परवर रहेगा।

फर्क केवल यहीं है बिस्तरों में,

वहाँ तो एक सा बिस्तर रहेगा।

नहीं रहतीं वहां खुशियां बरक्कत,

जहाँ पर नयन कोई तर रहेगा।

उसे दुश्मन कहो या गैर बोलो,

नदी का मूल तो पत्थर रहेगा।

रहेंगे वन सुरक्षित तो सुरक्षित,

सभी की सांस का यह घर रहेगा।

करेगा बात जो इंसानियत की,

उसी के पांव में ये सर रहेगा।

- धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव

सम्पादक

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