तू खोजता रहा मुझमें....?

काश कि तू करता मुझे

गात से परे प्यार
तो रखती मैं
खुले भावनाओं के द्वार।
तू समझता मेरे मन के भाव
तो रखती मैं
खुले अंतर्मन के द्वार।
पर तू तो.....?
मैं ढूढ़ती तुझमें
नश्वर जगत में
कृष्ण सा प्यार
पर तू ढूढ़ता रहा मुझे
देह के आसपास।
पाया तूने मुझे बेशक पाया
पर क्या समझ पाया कभी
मेरे अंतस के घाव
जो सिसकते थे नीरवता मे,
तपते थे थार की रेत से,
ठंडे जमे पड़े
जो हिम की तरह।
तू मेरी नीरवता में
ना संगीत भर सका
दर्द को मेरे
पिघला न सका।
तू ढूढ़ता रहा मुझे
ऊपरी सतह पर....
तू प्यार करता रहा
तेरी नजर में श्रेष्ठ सर्वश्रेष्ठ
प्यार जो था सिर्फ
काया से व्यहवार
और में खोजती रही
तुझमें गात्र से परे
आत्मा में बसा प्यार ।
तू थिरकता रहा
वपु पर मेरे
तू खेलता रहा अलको से मेरी
नयनों से देखा तूने
बेशक देखा
पर क्या देख पाया
मेरा असीम प्यार
जो छुपा था
वारि में शीतलता की तरह
पर तू कहाँ छू पाया
मेरी शीतलता को
क्योंकि
तू तो खोजता रहा
मुझमें बस.....….?

अप्रकाशित मौलिक रचना
कवयित्री:-गरिमा राकेश गौत्तम
पता:-कोटा राजस्थान