तुम भूमि हो आधार हो

सद्गुणों का कोश मधुरिम, विवेक-बुद्धि आगार हो।

तुम सर्जना का हो फलक, तुम भूमि हो आधार हो।।


गोदी में खेले तुम्हारी लोकरंजन राम भी।

ममता के आंचल तले पले नंदनंदन श्याम भी।

तुम अमरता हो मधुरता, तुम शुभ सुखद संसार हो।।


धाय पन्ना के त्याग से इतिहास का आंगन भरा।

लिपट वृक्षों से दिया जीवन, मुस्काता कानन हरा।

मरुभूमि को करती उर्वरा, तुम धरा श्रंगार हो।।


तुम सृष्टि का पर्याय हो, मृदु विमल नवल विचार भी।

सभ्यता तुमसे सुवासित, सुरसरि धवल धार भी।

तुम वसुधा की सुरभि हो, मंदाकिनी गगन हार हो।।

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प्रमोद दीक्षित मलय

शिक्षक, बांदा (उ.प्र.)

मोबा: 94520-85234