कैसे कह सकते हो

 

कैसे कह सकते हो 

कि 

मैं 

तन्हा और अकिंचन हूँ 

देखा है कभी 

मेरे इर्द-गिर्द 

ओर पास घूम घूम कर 

मेरे अन्तर में झाँक कर 

नहीं न

सुनो

साथी हैं मेरे 

कुछ टूटे बिखरे सपने 

कुछ अनछुए लम्हे 

कुछ अनकहे घुट घुट कर दम तोड़ते लफ्ज़ 

जिन्हें ओठों की दहलीज के

इस पार झांकने का मौका ही नहीं मिला 

और 

मन की सिकता पर 

आँखों की सीपी में मोती से चमकते आँसू 

और 

और क्या 

यह सब कुछ कम हैं क्या ? 

                                   देवयानी भारद्वाज

                                 उसायनी फीरोजाबाद