मैं रम जाऊँ

विलीन नही होना

मुझे सरिता सा

मीठी होकर भी

क्यूँ बनूँ खारा सा।

अथाह वारि 

है उसके पास

तो क्यूँ जाऊँ

मैं जलधि के पास

तृष्णा है मेरी

तृषा मिटाऊँ

थार के बालू में

बहती जाऊँ।

भटकते किसी

प्राणी की पिपासा बुझाऊँ

प्यासे रेगिस्तान में

मैं रम जाऊँ।

जरूरी नहीं कि

मैं तृप्त हो जाऊँ

    पर

किसी को मैं तृप्त कर जाऊँ।

 तृप्त करना

तृप्त होने से श्रेष्ठ है

विलीन होने से

रमना श्रेष्ठ है।

सरिता बन मैं

बहती जाऊँ।

थार में ही रम जाऊँ।

अप्रकाशित मौलिक रचना

सर्वाधिकार सुरक्षित

गरिमा राकेश गौत्तम

खेड़ली चेचट कोटा