"यह कैसा जीवन है?"

 सपनों का संग था, जीवन में रंग था,

 छाई कैसी धुंध की सपने  बिखरने लगे|

यह कैसा जीवन है? मानव डरने लगे|

 ना कोई आहट की, कैसे तुम आए हो?

  मानव के  जीवन में, काल से लगने लगें|

 यह कैसा जीवन है? मानव डरने लगे|

 कैसी बीमारी है? बनी महामारी है ,

जीवन में खुशियों को ,तुम निगलने लगे|

 यह कैसा जीवन है? मानव डरने लगे|

 ऐसा प्रहार किया ,जीवन पर वार किया|

 सपनों की डाली को, तुम कुतरने लगे|

 यह कैसा जीवन है? मानव डरने लगे|

 बदला बदला जहां, जीवन अब है कहां?

 कर दो! दया  प्रभु, "रीत" यह कहने लगे|

 यह कैसा जीवन है? मानव डरने लगे|


 स्वरचित, अप्रकाशित एवं मौलिक रचना 

लेखिका/ रचनाकार: रीता तिवारी  "रीत"

मऊ, उत्तर प्रदेश से