तुझसे मिलने अब कैसे आऊँ,,,,,,,

रातें कितनीं लंबी हैं  तुझ्को

ये मालुम नहीं है,
मैं तेरा हुँ  ,तू धड़कन मेरी  
क्या मालूम नहीं है,
सारी दुनिया मे महक उठी है ,
प्यार की ख़ुशबू,
तुझसे मिलने अब कैसे आऊँ,
ये मालूम नहीं है,
मेरी आँखों में सब पढ़ लेते हैं,
अब नाम  तेरा  ये,
कहां छुपा के अब तुझको रख 
लूँ ये मालूम नहीं है,
भटके भटके ख़्वाब हसीं सब 
फिर आँखों में हैं,
ताबीरें इनकी क्या होंगीं ,ये भी 
तो मालूम नहीं हैं,
तुझको ही में रब से मांगूँ ,दूजी 
हसरत ही नहीं,
तू ही बतला दे मुश्ताक़, सूरत 
कोई मालूम नहीं है,

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
"सहज़"
हरदा मध्यप्रदेश