पंचायती मुर्गा

 

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

सच ही कहा है कि राजनीति में साम-दाम-दंड-भेद की नीति का उपयोग जायज है,आज हम भले ही 21 वी शताब्दी के तीसरे दशक में पहुंच गए लेकिन आज भी वर्चस्व की जंग जारी है और इस जंग को जीतने के लिए बकरा-मुर्गा का हलाल होना तो स्वाभाविक है, गाहे-बगाहे पंचायती चुनाव का बिगुल बज चुका है और 'मुंगेरीलाल के हसीन सपने"भी दिखाए जा रहे हैं', कोई लान्टेन लेकर गांव को हाईटेक बनाने का ख्वाब देख रहा है तो कोई साड़ी, चूड़ियां,बिछिया,पायल भेंट कर वोट कमा रहा है एक वोट के खातिर नेताजी नतमस्तक हैं खेत से लेकर चचा जान की धोती तक दण्डवत प्रणाम कर एक एक वोट के खातिर गुहार लगा रहे हैं 'अपनी गरज हो तो गधे को भी बाप बनाना पड़ता है' सो कवायत जोर-शोर से जारी है, मोबाइल के रिचार्ज से लेकर ससुरारी खातिर मोटर गाड़ी के बंदोबस्त में नेताजी पसीना-पसीना हैं कि कहीं आचार संहिता की भेंट न चढ़  जाए सियासी गणित के आंकड़े विरोधी ना छीन लें, रसगुल्ला से लेकर नगदी तक सियासत में ले आए जिससे की कुर्सी सलामत रहे और विरोधी परास्त हो अभी कुछ कोर कसर बाकी थी ब्रह्मास्त्र रूपी मदिरास्त्र  का प्रयोग कर सब कुछ मुट्ठी में हो ही जाता है, एक बार किसी मदिरा प्रेमी ने नेताजी से पूछ ही लिया कि हमें काहे किसी प्रेमिका की भांति पटियाए रहे हो! हमारी इच्छाओं को काहे सर माथे पर इतने तवज्जो दे रहे हो आजकल! क्या मिलेगा एक वोट देने से अंगूठे की सियाही जो नाखूनी बन गई तो भला इससे हमरा का लाभ होगा? दो दिनो के बाद ये उड़न छू और आप नौ दो ग्यारह यकीनन नेताजी अब भाषण वाली चिट्ठी खोली और कहा की सच्चे लोकतंत्र में भक्ति ही यानी सेवा ही काम आती है और कुछ नहीं। मदिरा प्रेमी भी भक्ति में लीन हो गया फिर नेताजी वरदान देने की मुद्रा में प्रकट हुए और कुछ वरदानों को मांगना निषेध कहते हुए तथा  कुछ के आगे फुल स्टॅाप का चिन्ह था, रोटी,कपड़ा और मकान छोड़कर बाकी सब देंगे कुछ भी मांगो सत्ता के लिए हाजिर हैं,यह हमसे ही नहीं बचा तो तुम्हें कहां से देंगे वहीं दूसरी ओर उम्र का शतक पूरा कर प्रधानी पद उम्मीदवार इसे लोकतंत्र में जान फूंक दी और तथाकथित घूंघट भी प्रेरणा का स्त्रोत बन डिमांड ऑन वोट की हिट लिस्ट में टॉप पर है नेताजी इसलिए सभी विकल्प खुले रखे हैं कुर्सी, तलवार, चम्मच,मेज और कटोरा लेकर दर-दर भटक रहे हैं,लोकतंत्र मजबूत हो इसलिये दया दृष्टि कीजिए आपका एक वोट गांव की तकदीर और तस्वीर बदल सकता है पंचायती मुर्गा और बकरा से सावधान नीली स्याही अंगूठे की ना हो वह नागरिकता की शान बने यहीं से है लोकतंत्र की शुरुआत पंचायत चुनाव।

कवि कुमार प्रिंस रस्तोगी 

लखनऊ,उत्तर प्रदेश...