धरा से मिटता कूंआं और पीपल का वृक्ष चिन्ता का विषय

दुल्लहपुर/गाजीपुर। 'कुइयां के ठंडा पानी, और पीपल की छांव' जो कभी गांव की पहिचान‌ हुआ करते थे।अब  दूर तलक बमुश्किल दिखाई देते हैं।वह भी अपनी बदहाल सी स्थिति में।कभी अपने जमाने की शान कहलाने वाला कूंआं बढ़ती मानवीय आबादी के अतिक्रमण के चलते समतलीकरण का शिकार बनगया और उसके सीने पर  पक्का बना तनकर खड़ा हो गया। ऐसा इसलिए भी हुआ कि निजी तथा सरकारी जन  सुविधाओं के मद्देनजर छोटी बड़ी पेयजल की मशीनें सर्व सुलभ हो गईं।मगर आज कल  के भयावह परिवेश में विध्वंशक अगलगी जैसी विनाश लीला को रोक पाने में क्रीत्रिम उपादान अपना‌ हाथ सबसे पहले  खींच लेते हैं । जबकि कूंआं एक निश्चित जलसंग्रह के साथ साथ जलसंसाधनका मुख्य स्रोत था। परोपकार की भावना का आदर्श स्वरूप था।चाहे क्यों न विकास के चलते अनेकों पेयजल संसाधन सुलभ कराकर जल संकट से बचाने  का प्रयास किया गया है कूएंका अपना एक अलग महत्व है।कूंए का ठंडा और मिस्री के मीठापन को फीका कर देने वाला मीठा जल‌का कहना ही क्या? प्राकृतिक संरक्षण में रचा बसा कूंआं कृत्रिम उपादानों के कारण अपने आप को हतोत्साहित है।वरना शीतल स्वादिष्ट जल‌के साथ  कुओं की ऊंची जगत गांव की चौपाल में सुमार थे। धड़ल्ले से लोप हो रहे कूंओ की दशा देखकर जब कठिन  हिन्दू नियमों की चार दसक पुरानी बात याद आती है की गोहत्या से मुक्ति के लिए सन्याशी रूप में सात कूंओ की झंकाई  का कार्य आज कितना कठिन होता।पहले तो कुंए ही मयस्सर नहीं होते।अगर कदाचित हो भी जाते तो एक अथवा दो।सात तो नामुमकिन लगते। बहरहाल कुओं की खात्मा के साथ गोहत्या मुक्ति की सारी बंदिशें खत्म हो गई।

अब बात पीपल वृक्ष की की जाये तो मानवीय स्वार्थ और विवशता के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता। हमारे आदर्श वेद वेदांग आज भी अपनी महति सुक्तियों से पीपल वृक्ष की महत्ता के प्रति हम सबको प्रेरित करते हैं। इसलिए कि मानव अपने आस्था और विश्वास के पथ से भटकने लगा है।नारी समाज जिस वृक्ष में तन-मन और बचन से निष्ठावान होकर   सफेद धागे बांधने से लेकर धूप-दीप तिल अक्षत से पूजन अर्चन कर घर परिवार गांव जवार की कुशल कामना  किया करती थी आज वह वृक्ष अदृश्य होने लगा है।जिस पीपल वृक्ष की मात्र एक टहनी तोड़ लेने से मनुष्य पाप का दोषी हो जाया करता था वही मनुष्य अपने विस्तारवादी विचार धारा के चलते अनेकों वृक्षो के साथ  पीपल वृक्ष को भी खत्म करने  पर तुल गया।जिसकी आवश्यकता की पूर्ति के लिए ढूंढना पड़ता है। कहीं कहीं तो एक गांव को  दूसरे गांव से सहयोग लेने की विवशता होती है  जो खुद की,  की गई बेवकूफी का नतीजा है।अब‌तो पीपल वृक्ष का उपयोग पूजा पाठ में कम तथा अशुभ(श्राद्ध) कार्यो में ज्यादा किया जाता है।वेद वर्णित है कि  मनुष्य के मृत्युपरांत दाग संस्कार के बाद घंट बांधने का कार्य पीपल वृक्ष में ही किया जाता है, इसके पश्चात् दस दिवसीय श्राद्ध कार्यक्रम सम्पन्न किया जाना श्रेयस्कर माना जाता  है। इसलिए कि "मूले ब्रह्मा त्वचा विष्णु शंकर साखा मेवच।पात्रे पात्रे देवानाम् वृक्ष राज नमोस्तुते"।।का मंत्रोच्चारण करके सुबह शाम परिक्रमा करते हुए पीपल में जल देने से  भटकती प्रेतात्मा को दागदाता की श्रद्धा ग्राह्य होती है।

गौरीशंकर पाण्डेय सरस