चाय कामगारों की हालत बेहतर हो

पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव का एक दिलचस्प दृश्य विभिन्न राजनेताओं का चाय के साथ नजर आना है. इस पेय का इस चुनाव में महत्व इसलिए है कि पांच में से चार राज्य देश के चाय उद्योग में सर्वाधिक योगदान करते हैं. असम में दुनिया के सबसे बड़े बागान हैं. पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग चाय जैसी उत्कृष्ट चाय पैदा होती है. केरल के सुरम्य मुन्नार और तमिलनाडु के नीलगिरी क्षेत्र में चाय की व्यापक खेती होती है. ऐसे में अचरज की बात नहीं है कि चाय बागानों के कामगारों की हालत एक अहम मुद्दा है. चाय के कारोबार में पारंपरिक रूप से व्यापक खेती, पत्तियां चुननेवाले बहुत से कामगार और पत्तियों को मसलकर चाय बनानेवाली फैक्टरियां शामिल होती हैं. लेकिन कीमतों में उतार-चढ़ाव और मुनाफे में कमी की चुनौती को देखते हुए इस कारोबार के भविष्य को लेकर चिंताएं स्वाभाविक हैं, जिसमें आज भी 11.6 लाख लोग कार्यरत हैं, इनमें करीब 58 फीसदी महिलाएं हैं.

 इससे जुड़े कामकाज से अतिरिक्त 60 लाख से अधिक लोग जीविका कमाते हैं. इस क्षेत्र का महत्व यह है कि इसे भारत में दूसरा सबसे बड़ा रोजगारदाता माना जाता है. वर्ष 2020-21 के केंद्रीय बजट में चाय बागानों में कार्यरत लोगों, विशेषकर महिलाओं और उनके बच्चों के कल्याण के लिए आवंटित एक हजार करोड़ रुपये जैसे कार्यक्रम कामगारों और उनके मतों के लिए लक्षित हैं. अधिकतर कामगार बेहद खराब हालत में रहते हैं और उन्हें विभिन्न कानूनों से मिले संरक्षण का लाभ नहीं मिल पाता है. दूसरी तरफ, बागानों के मालिक शिकायत करते हैं कि लागत खर्च तथा वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने से उनके कारोबार को गंभीर चुनौती मिल रही है. असम के कामगार को रोजाना 167 रुपये मिलते हैं, जो न्यूनतम है. 

चुनाव को देखते हुए फरवरी में भाजपा सरकार ने इसमें 50 रुपये की वृद्धि की है, लेकिन यह अब भी बहुत कम है. इसकी तुलना में केरल में अतिरिक्त वैधानिक लाभों के अलावा रोजाना की बेसिक मजदूरी 380 रुपये है. असम में 365 रुपये रोज देने का कांग्रेस का दावा बेअसर है, क्योंकि राज्य में कांग्रेस को तीन बार लगातार सरकार में आने का अवसर मिला था और स्वर्गीय तरुण गोगोई सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहनेवाले व्यक्ति बन गये थे. कारोबार की बदलती स्थितियों को देखते हुए यह आशंका है कि पूरा क्षेत्र सिकुड़ रहा है और जल्द ही यह संकटग्रस्त हो सकता है. कभी ऐसा भी था कि चाय से रोमांस की भावना पैदा होती थी और बागान मालिक शानदार जीवन बिताते थे. अब जमीनी सच्चाई बदल रही है. छोटे उत्पादक बढ़ रहे हैं और लोग अपने घर के साथ भी इसे उगाने लगे हैं. असम सरकार के अनुसार, छोटे उत्पादकों की संख्या तेजी से बढ़ी है और चाय की खेती ने एक चक्र पूरा कर लिया है. राज्य में, खासकर ऊपरी हिस्से में छोटे किसानों की बढ़ती संख्या का नतीजा यह है कि वे ऊपज में 20 फीसदी से अधिक योगदान करते हैं तथा बड़े बागान उनकी पत्तियों का बड़ा हिस्सा खरीदते हैं. छोटे किसानों के लिए चाय की खेती आमदनी का मुख्य जरिया बन गया है.

इसके बावजूद पारंपरिक खेती में सर्वाधिक कामगार हैं. उनका मानना है कि विभिन्न सरकारों ने अपने वादों को नहीं निभाया है तथा कंपनियों द्वारा कानूनों के उल्लंघन को उन्होंने नजरअंदाज किया है. कानूनी प्रावधानों में कामगारों को उचित मजदूरी देने, उनके बच्चों को अच्छा स्कूल देने, आवास और चिकित्सा सुविधाएं देने की व्यवस्था है. यह आरोप भी निराधार नहीं लगता है कि राज्य सरकार और चाय कंपनियों ने कामगारों के श्बाहरीश् होने का फायदा उठाया है, जिनका इतिहास 19वीं सदी से जोड़ा जा सकता है, जब असम के गबरू पहाड़ियों में खेती की शुरुआत हुई थी. 

बागान मालिकों का कहना है कि मुनाफे में कमी की वजह से गति बरकरार रख पाना कठिन है. दुनिया में 35 चाय उत्पादक देश हैं और प्रतिस्पर्द्धा बेहद कड़ी है. यदि भारत अपनी स्थिति को बनाये रखना चाहता है, तो बहुत सारे बदलाव करने होंगे. बागान मालिकों के संगठन सरकारी समर्थन बढ़ाने की मांग कर रहे हैं तथा वे टी बोर्ड समेत विभिन्न कमोडिटी बोर्डों के बजट आवंटन में बड़ी कटौती होने से नाराज हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री को संबोधित एक हालिया पत्र में कहा है कि इससे विकास और कामगारों के कल्याण की उन योजनाओं पर असर पड़ेगा, जो बोर्ड द्वारा लागू किये जा रहे हैं. ऐसी चुनौतियों के कारण चाय कारोबार को बदलने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. सुदूर दक्षिण में जब टाटा टी लिमिटेड ने अपने ब्रांडेड कारोबार पर ध्यान केंद्रित करने के लिए 2005 में मुन्नार के अपने अधिकांश बागानों को छोड़ा था, तब भी कारोबार की संरचना बदल रही थी. टाटा टी लिमिटेड के बाद स्थापित कानन देवन हिल्स प्लांटेशन कंपनी बिल्कुल अलग तरह की है. केरल के ऊंचाई वाले इलाके में 23.8 हेक्टेयर में फैले बागान में राज्य के कुल उत्पादन की 31.5 फीसदी चाय पैदा की जाती है. 

यह दक्षिण भारत की सबसे बड़ी कंपनी होने के साथ दुनिया की कर्मचारियों के स्वामित्व की सबसे बड़ी कंपनी है. सहभागिता आधारित प्रबंधन व्यवस्था ने 99.9 फीसदी कर्मियों को कंपनी का शेयरधारक बनना तथा उनके हाथ में निर्धारित साझा पूंजी का करीब 60 फीसदी का मालिकाना देना सुनिश्चित किया है. यह कंपनी औपनिवेशिक दौर की जेम्स फिनले एंड कंपनी की विरासत को आगे बढ़ा रही है, जिसने दक्षिण में चाय कारोबार को विकसित किया था. दक्षिण में शुरुआती ब्रिटिश कारोबारियों ने चुपचाप एक शानदार कहानी गढ़ी, जो भारत से, शायद ब्रिटेन से भी अलग थी. चाय के पौधों से भरे ठंडे, अक्सर नम, हरी-भरी पहाड़ियों से गुजरता रास्ता शानदार बंगलों की ओर ले जाता था, जिनके लॉन खूबसूरत थे. वहां पोशाक में सजे बैरे चाय और अन्य चीजें परोसते थे. जश्न मनाते, गोल्फ खेलते, खाना-पीना करते औपनिवेशिक क्लबों का सामाजिक जीवन बागान लगानेवालों और पत्तियां चुननेवालों की जिंदगी से पूरी तरह अलग था.

शायद यह अंतर आज की बहुत सारी समस्याओं की वजह हो सकता है. जब तक ऑटोमेशन नहीं आ जाता, सबसे निचली कतार में खड़े पत्तियां चुननेवाले कामगारों के पास कारोबार का सबसे अहम काम बरकरार रहेगा. जो पत्तियां व कलियां ये कामगार चुनते हैं, उनका सीधा असर पैदावार, गुणवत्ता और उत्पादन के खर्च पर पड़ता है, जिनसे बागानों के हिसाब का निर्धारण होता है. अब उनकी दुनिया को बेहतर करने का समय आ गया है.