नमस्कार मत कहिए

है उजाला तो उसे अन्धकार मत कहिए।

किसी भी साधू को झूठा लबार मत कहिए।


मगर अपमान जो हुआ है आंख के आगे,

किसी भी हाल उसको भी प्यार मत कहिए।


होंठ सीकर रहो मन्जूर है लेकिन भाई,

साफ गाली को कभी पुरस्कार मत कहिए।


हमारा काम है सच्चाई को बता देना,

हवा गरम है तो शीतल बयार मत कहिए।


ये राजपाठ सल्तनत का नशा वाजिब है,

मगर नशे में भी सबको गंवार मत कहिए।


झूठ के पक्ष में तलवार भांजने वालों,

आज से खुद को कहीं कलमकार मत कहिए।


अपने अपमान के प्रतिवाद में मुमकिन हो तो,

अभी से उनको कहीं नमस्कार मत कहिए।


धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव 

सम्पादक                                                            

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