मलय पवन सुवास बिखेरे

 नेह-गुलाल उछाल उड़ायें अंजुरी भर-भर होली में।

वासंती मन बांट रहा है, खुशियां ले कर झोली में।।


ननद-भावजें बांट रही हैं, व्यथा-कथा सुख सपनीले।

कभी विहंसते खंजन दृग, और कभी हों नयन पनीले।

मदन प्रीति-रस घोल रहा है उनके हिय, उर-बोली में।।

वासंती मन बांट रहा है, खुशियां ले कर झोली में।।


तरुण तन में मुदित मनोज मन मकरंद की मधु चाह में।

उड़ रहे हैं बन मगन मधुकर वन वाटिका रुचि राह में।

'मलय' पवन सुवास बिखेरे द्वार गली घर खोली में।।

वासंती मन बांट रहा है, खुशियां ले कर झोली में।।


सांसों की पगडंडी में बंजारा मन है घूम रहा।

प्रियतम से मिलने को आतुर और खुशी से झूम रहा।

प्रकृति-पुरुष का मिलना होगा पलाश परिमल डोली में।।

वासंती मन बांट रहा है, खुशियां ले कर झोली में।।

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प्रमोद दीक्षित मलय

शिक्षक, बांदा।

मोबा. 94520-85234