कोप

   "नानी! घर में बंद बंद बहुत बोर हो गया हूँ, क्या करूँ?" अपने ननिहाल आकर लॉकडाउन में फँस गया चीकू मुँह बनाता हुआ बोला। "तुम मुझे कहीं जाने भी नहीं देती। ऊँहहह।"

      "नहीं दे सकती, चीकू! समझा कर, शाम हो गई है, छत पर जाकर ठंडी हवा खा।" 

    "नानी! आप और मम्मा भी चलो।" सात वर्षीय चीकू ठुनकता हुआ बोला।

    "देखो नानी! उस ऊँचे वाले पेड़ पर चिड़िया का घोंसला, उसमें प्यारे-प्यारे अंडे दिख रहे हैं। कल माली काका आएँ तो उनसे उतरवा कर देना, प्लीज। अंडों से बच्चे निकलेंगे तो मैं पालूँगा। बड़ा मजा आएगा।" छत पर जोश में चीकू तालियाँ बजाने लगा।

      "क्या तू जानता नहीं, चीकू? चिड़िया के अंडे छू लिए जाएँ तो चिड़िया उन्हें सेना बंद कर देती है।" मम्मी बोली।

    "क्यों मम्मी? मैं माली काका से ऊँचे से उतरवाकर गुड़हल के पेड़ पर रखवाऊँगा, ताकि आसानी से देख सकूँ, वहाँ चिड़िया मम्मी भी पहुँचेगी, अंडे सेने के लिए। मैं उसे बिल्कुल डिस्टर्ब नहीं करूँगा, पक्का प्रॉमिस।"

   नाती को बेटी के डाँट से बचाने के लिए नानी ने समझाना प्रारंभ किया, पर मुद्दे से भटक भावनाओं के प्रवाह में बह गईं;"प्यारे चीकू! जिस प्रकार चिड़िया माँ अपने अंडों और घोंसले के साथ कोई छेड़छाड़ या परिवर्तन बर्दाश्त नहीं करती, उसी प्रकार धरती माँ अपने पर्यावरण के साथ लगातार की जा रही छेड़छाड़ शायद बर्दाश्त नहीं कर पा रही हैं। तिसपर अनियंत्रित जनसंख्या का बढ़ता बोझ एवं इंसान की बढ़ती स्वार्थलोलुपता, थक गई हैं वे भी। कोई कितना सहन करे।"

   "एक वक्त था, जब सुरम्य वनों से आच्छादित थी धरती, उसमें पशु पक्षियों का बसेरा, कलकल बहती नदियाँ, पर्वत मालाएँ। अब हैं, कंक्रीट की सड़कें, अट्टालिकाएँ, प्रदूषण का जहर उगलती फैक्ट्रियाँ, लगभग सूख चुकी प्रदूषित नदियाँ। तभी उनका कोप झेलने को मजबूर हैं हम।" 

      चीकू की बाल बुद्धि क्या खाक समझती, उसका सारा ध्यान चिड़िया के घोंसले पर था। पर उसकी मम्मी जरूर समझ गई। उनकी आँखों में एक नमी सी तैर गई। दिल से दुआ निकली, "हे धरती माँ! हमें माफ करो और अपनी विनाशलीला को यहीं रोक दो।"

   चीकू की नानी ने बेटी की दुआ सुनी और कहा, "आमीन।"

नीना_सिन्हा/पटना।(मौलिक)