हम फ़िदा-ए-लखनऊ

 लखनऊ हम पर फ़िदा है हम फ़िदा-ए-लखनऊ

आसमां की क्या हकीकत जो छुड़ाए लखनऊ।

यकीन नहीं होता है, पर निष्ठुर हकीकत है कि आज लखनऊ ही क्या, हम सब को छोड़कर अपने प्यारे पद्मश्री डॉक्टर योगेश प्रवीन इस अंजुमन को अलविदा कह गये। वरिष्ठ इतिहासकार,अवध के इनसाइक्लोपीडिया डा. योगेश प्रवीन साहब की निगाह और कलम से लखनऊ का शायद ही कोई पहलू अनछुआ रहा होगा।लखनऊ के इतिहास,उसकी इमारतें,शायरी,नवाबों या बेगमातों के बारे मे उनके पास जानकारियों का पिटारा था।उनकी किताबें दस्तावेज बन गई हैं।वे खुद भी लखनऊ को ही जीते थे।सादगी की जीती जागती मिसाल थे।उनसे मिलना या बात करना ही बहुत कुछ सिखा देता है।उन्हें सुनना और पढ़ना एक अलग ही अनुभव है।इतने सारे प्रतिष्ठित सम्मान मिलने पर भी उनका वही लखनवी अंदाज हमेशा बरकरार रहा।उनके जीवन और कार्यों के ऊपर बहुत शोध हो चुके हैं पर उनकी विनम्रता और संजीदगी मे कोई कमी नहीं। 

अभी 10 अप्रैल को बाल संग्रहालय में राष्ट्रीय पुस्तक मेला में वसुंधरा फ़ाउंडेशन द्वारा पद्मश्री डा योगेश प्रवीन सम्मान समारोह एवं"गांधी और आत्मनिर्भर भारत" विषय पर आयोजित संगोष्ठी में आप ने लखनऊ की बसावट मे विभिन्न प्रदेशों और संस्कृतियों के लोगों के योगदान के बारे मे जानकारी दी। विनम्रता इतनी कि लखनऊ के मशहूर दास्तानगोई के कलाकार हिमांशु बाजपेयी के आने पर उन्हें लखनऊ का शहजादा कह कर मंच पर स्वागत किया। कार्यक्रम मे पूरी तन्मयता से सबका उत्साहवर्धन करते रहे। होली के दिन पहले बात करके बच्चों के स्कूल के लिए एक कार्यक्रम की स्वीकृति भी ले ली थी। आप का जाना एक युग का पटाक्षेप हो जाना है। आपको सच्ची श्रद्धांजलि लखनवी तहज़ीब को बचा कर रखना ही होगा। 

राकेश श्रीवास्तव