राम सीता विरह वेदना


सीता को धुविया दोष लगाया,राम ने हिय मे दोष छिपाया।

सीताजी जाने राम हिय भाव, सीता ने पता लगाया तत्काल।

सीता राजमहल त्याग किया, राम ने सीता वनवास दिया।

लक्ष्मण सीतामाँ छोड़न गए, पर वन जाने की लगायी रोक। 

सीता ने बनायी घास की आन, लक्ष्मन विवश हुए  परेशान।

सीता वाल्मीकि आश्रम पहुंची, वाल्मीकि ने सीता आदर कीन्हि।

वनवासियों को परिचय दिया, समझें सब कोई देवी हैँ सीता।

श्री रामजी विष्णु का अवतार हैँ, सीता श्री लक्ष्मी का अवतार हैँ।

सीता कुटिया में करें निवास, जहाँ छायी थी घास ही घास। 

जल भर के लावें माता  सीता, सब काम काज करें माँ सीता।

धरती पर करें विश्राम माँ सीता, राम के हिय बसी हैँ प्रिय सीता। 

राम बसें हैँ प्यारी आँखों सीता, सीता बिन क्या राम का जीना।

श्री राम भी धरती पर विश्रामें, और सीता को भूल न पावें।

राम को दुख हुआ है अपार, पर सीता जानें सारी ही बात। 

ऋषि वाल्मीकि सब दृश्य बतावें, सीता को नित्य कुछ  समझावें। 

उठत चलत राम सोचें सीता, पल पल राम याद करें सीता।

सीता वन में दुखी अश्रु बहावें,राम राजमहल में दुःखिया वें।

ऐसा अटूट प्रेम अलग न होवे, सीता रामअमर   अमर ही रहे। 

सीता पवित्रता दिखलानी थी, धोबी की बात झुटलानी थी। 

ये राम सिया की रामायण है, सब कुछ विधि का विधान है।

ईश्वर होकर विरह को सहा, 

देव लोक खड़ा सब देख रहा।

पूनम पाठक बदायूँ