क्रांतिकारी और प्रभावशाली विचार के थे- बाबा साहेब

       आज से लगभग एक सौ इक्तीस वर्ष पूर्व (14 अप्रैल, 1891) भारत में भी एक ऐसे ऐतिहासिक बालक ने जन्म लिया था, जो सामाजिक न्याय की लोकतांत्रिक सभ्यता के निर्माण का अगुवा बना था। उस महापुरुष का नाम है बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर। यह भी हमारे इतिहास का कड़वा सच है कि अगर उन दिनों भारत मे अंग्रेजी साम्राज्य न होता तो डा. अम्बेडकर को भी अवश्य ही शिक्षा लेने के अपराध मे अदालत का सामना करना पड़ता, क्योकि दलितों व शुद्रों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार न था। बावजूद ब्रिटिश सम्राज्य में भी डा. अम्बेडकर को दलितों के मूलभूत अधिकारांे के लिए अनेक बार अदालतों मंे उनकी पैरवी करनी पड़ी थी।

           इस तरह की सामाजिक विषमता से भरे परिवेश में भी अम्बेडकर कैसे पढ लिख गए, इसका मुख्य कारण यह था कि उनके पिता रामजी ब्रिटिश सेना मे सूबेदार थे और लगभग 14 वर्ष तक सैनिक विद्यालय में प्रधान शिक्षक रहे। सूबेदार रामजी पढे लिखे थे। सेना में भर्ती होने के बाद उन्होंने अंग्रेजी सीखी। एल. आर. बाली लिखते है कि ‘‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी सरकार की सेना मे सैनिक और उनके परिवारो के छोटे-बड़ सभी व्यक्तियों को अनिवार्य शिक्षा दी जाती थी। सेना में अनिवार्य शिक्षा आई। हर एक पलटन के लिए पृथक स्कूल थे। सैनिकों के लिए योग्य अध्यापक तैयार करने के लिए पूना में एक नार्मल स्कूल था। सूबेदार रामजी चाहते थे कि अपने इस चैदहवे पुत्र (अम्बेडकर) को अधिक से अधिक पढ़ाऊ।’’ और इस तरह अम्बेडकर शिक्षा की सीढ़ियां चढ़ते गये। हालांकि उन्हें कदम-कदम पर इस बात का अहसास कराया गया कि वे दलित है। न केवल स्कूल में बल्कि स्कूल के बाहर भी/सार्वजनिक स्थानों पर उनके लिए कोई स्थान न था।

          भारत की आजादी के 75 साल गुजर जाने के बाद भी दलित तो साक्षर तक नहीं हो पाए हैं, छुआछूत तक समाप्त नहीं हो पाई है और अब भी दलितों को एक औसत नागरिक का दर्जा नही मिल पाया है। इतने समय में सामान्य जनवादी सुधार मसलन- अनिवार्य शिक्षा, सभी विभागों में निर्धारित प्रतिशत के अनुसार आरक्षण, भेदभाव या छुआछूत की समाप्ति और भाईचारे एवं समानता के आधार पर सबमें समान नागरिकता की भावना आदि तो नजर आनी ही चाहिए, क्योंकि कि इनमें न तो अतिरिक्त फंड चाहिए और न ही कोई उच्च तकनीकी ज्ञान। ये सब बहुत ही औसत किस्म के जनवादी सुधार हैं, जो बिना किसी रूसी, अमेरिकी, जापानी, फ्रांसी अथवा ब्रिटेन की सहायता के भी किए जा सकते है।

          बाबा साहेब ने ज्ञान को उन्नति, बुद्धि को नीति, गति व सम्पति तथा शिक्षा को मुक्ति का मार्ग माना और दर्शन दिया कि गुलामी की जड़ शिक्षा का अभाव ही है। अशिक्षा के कारण ही हम सदियों से नरकीय और अपमानजनक जिन्दगी जीने वाला समाज बने रहे। 

          उन्होंने संदेश दिया कि तुम्हारी सभ्यता, संस्कृति, साहित्य, इतिहास और धर्म नष्ट कर दिया गया है। जाति के आधार पर किसी को ऊँचा मानना पाप है और अपनों को नीचा मानना महापाप है। आज भारत में राजा बनने के लिए रानी के पेट की जरूरत नहीं, तुम्हारे वोट की जरूरत है। तुम अपने वोट से खुद राजा बन सकते हो। तुम्हारा राजनीतिक प्रतिनिधित्व विकलांग ही नहीं, बल्कि लकवाग्रस्त हो गया है।तुम्हारे प्रति जो आकर्षण है, वो प्रेम का नहीं है, बल्कि तुम्हारे खो जाने का भय है। 

   बाबा साहेब का अटल विश्वास था कि शिक्षा से नयी आंखें मिलती है और इसी कारण परिवर्तन की प्रक्रिया आरंभ होती है। शिक्षा ही वह चाबी है जो उन्नति के द्वार पर लगे तालों को खोलती है। शिक्षा को बाबा साहेब अलादीन का चिराग, संजीवनी बूटी तथा रामबाण मानते है। उन्होंने शिक्षा को शेरनी का दूध बताया, उसे पीने वाले गुर्राने वाले पंडितों की संख्या कम न थी परंतु बाबा साहेब इस शिक्षा का उपयोग एक नये समाज के निर्माण के लिए करना चाहते थे। वे जानते थे कि शिक्षा एक हथियार है। इस हथियार को हथियाने के लिए यदि हमारे लोग चरित्रवान नहीं होगें तो उस हथियार का गलत उपयोग होगा। शिक्षा के जरिए सामाजिक लोकतंत्र को बढ़ावा देने वाले चरित्रवान विद्वान जब तक पैदा नहीं होते तब तक उस शिक्षा का कोई महत्व नहीं है। चरित्रहीन और विनयहीन शिक्षित व्यक्ति पशु से भी अधिक खतरनाक होता है। दलित युवाओं को मेरा यह मेरा पैगाम है कि एक तो वे शिक्षा और बुद्धि में किसी से कम न रहे, दूसरे ऐसो आराम मे न पड़कर समाज का नेतृत्व करे, तीसरे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी संभाले तथा समाज को जागृत और संगठित कर उसकी सच्ची सेवा करे।

        डाॅ0 अम्बेडकर ने कहा कि शिक्षा की गुणवता में सुधार के लिए प्राथमिक शिक्षा की नीव को मजबूत करना होगा। इसके बाद उच्च शिक्षा में स्वतः सुधार हो जाए। हमारे सामाजिक दुखों पर शिक्षा ही एक मात्र औषधि है। अपने गरीब एवं अज्ञानी भाइयों की सेवा करना प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति का फर्ज है। कोई तुम्हें अधिकार देने नही आयेगा, उनके लिए खुद लड़ों और छीन लो। हजार तलवारों से ज्यादा ताकत एक कलम मे होती है। शिक्षा शेरनी का वह दूध है, जो इसे पियेगा वह गुररायेगा। शिक्षित बनों, संगठित रहो, संघर्ष करो। अपना दीपक स्वयं बनों। बाबा साहब एक व्यक्ति न होकर एक विचार हो गये है। घने अंधकार में लोगों को राह दिखाने में वे एक दीपक के समान है।  बाबा साहेब क्रांतिकारी और प्रभावशाली विचार के थे ।

डॉ. नन्दकिशोर साह

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