धर्म स्थल और इनसे जुड़ी परम्पराएं विलुप्ति के कगार पर

हिमाचल प्रदेश के मण्डी शहर को ही नहीं अपितु सुकेत के करसोग क्षेत्र को भी छोटी काशी के नाम से जाना जाता है।साहित्यकार एवं इतिहासकार डाक्टर हिमेन्द्रबाली'हिम"जी का कहना है कि वस्तुतः सुकेत से ही पूर्व राज्य मण्डी का उद्भव हुआ है।भले ही सुकेत आज मण्डी जिले का एक अंग है।परंतु सुकेत की पुनर्स्थापना ने मण्डी को भी अपने सांस्कृतिक आवरण से ढांपा है। सुकेत के करसोग क्षेत्र में भी पांडवों ने 81 शिवलिंगो का निर्माण किया है। इनमें से 80 शिवलिंग तो एक रात में स्थापित कर दिए थे। एक शिवलिंग स्थापित करने को बाकी रहा था लेकिन सुबह होने के कारण इसे स्थापित नहीं कर पाए। यह विशाल शिवलिंग आज भी भगवान परशुराम जी द्वारा स्थापित ममलेश्वर महादेव मंदिर ममेल के गर्भगृह के दायें भाग में विद्यमान है।शेष 80 शिवलिंगो में से अधिकतर खण्डहर में बदलकर काल के गाल में समा गये। करसोग के हर गांव में किसी न किसी देवता का पूजा स्थल है। अनेक ऋषि मुनियों की साधना स्थली होने के कारण ये ऋषि मुनी भी आज देव और नागो के रुप में पूज्य हैं।समूचे करसोग क्षेत्र के गावों में ऐसे पूजा स्थल भी मिल जाएंगे जो आज खण्डहर में बदल गए हैं,या खण्डहर में बदलने को आतुर है।ऐसी ही धर्म धरोहरों में एक है चुराग पंचायत के अधिष्ठाता देव नाग सुनानी जी की अनूठी "प्रौड़"।अपने शाश्वत गौरव को उजागर करती हुई सी यह "प्रौड़"चुराग गांव के पजैरठी(राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला चुराग के पास) नामक उप-गाँव में स्थित है।यहां से सुनानी नाग जी की कोठी को भी पैदल रास्ता जाता है।इस अद्भुत "प्रौड़"की प्राकृतिक पृष्ठभूमि इस "प्रौड़"के उस पार भांति-भांति की मनोरम और अनुपम सौंदर्य छटाओं का सृजन करती है।यहां से दूर-दूर तक की पर्वत श्रृखलाएँ दृष्टिगोचर होती है।जो मन को बहुत लुभाती हैं। सुनानी नाग के पुजारी धर्मपाल भारद्वाज जी का कहना है कि जब भी नाग सुनानी जी का देवरथ कोठी भवन से बाहर निकलता है तो सबसे पहले इसी "प्रौड़"के साथ बने चबूतरे पर बैठता है।जहाँ हर व्यक्ति देव श्री जी के चरणों में शीश झुकाता है।प्राकृतिक सुंदरता और पुरातात्त्विक धरोहर रुपी इस अनूठी "प्रौड़"का निर्माण कब और किसने क्यों करवाया,कोई नहीं जानता।सुघड़ पत्थर की दो दीवारों के शीर्ष पर आर पार के किनारों को जोड़ने वाले विशाल पत्थर के सिवाय यहाँ न कोई भवन था न मंदिर।लेकिन फिर भी सदियों से द्वारनुमा यह अद्भुत ढांचा "प्रौड़"नाम से हर व्यक्ति को आकर्षित करता है।संभव है प्राचीन काल में इस अनूठी "प्रौड़" की कुछ न कुछ खासियत तो जरुर रही होगी, जो इस महत्वपूर्ण "प्रौड़" के प्रति देवता और श्रद्धालुओं की आज भी अगाध श्रद्धा व विश्वास अपरिमेय है।चुराग में नाग सुनानी का तालाब और इस ताल की पूर्व दिशा में खुले आसमान के नीचे अनेक प्रस्तर प्रतिमाएँ अद्वितीय और मनोहारी हैं।इस स्थान से भी अनेक अलौकिक घटनाएं जुड़ी हैं।चुराग पंचायत के धवास गांव के निवासी और करसोग क्षेत्र के अग्रणी समाज सेवक हेतराम ठाकुर जी का कहना है नाग सुनानी जी के चुराग,सुनान झाओगी,वटाड़,नागड़ा,शनोटी,शड़ई,
बरगोट,सुनान,पजैरठी जैसे देवता से संबंधित संलग्न क्षेत्रों में प्राचीन पूजा स्थल नाग सुनानी जी की महत्ता गौरव और वैभव के प्रतीक हैं।इन गांवों से प्रति संक्रांति व देवोत्सवो के अवसर पर को लोग चुराग स्थित मूल सुनानी नाग मंदिर में श्रद्धा सुमन अर्पित करने आते हैं। पुरातत्व चेतना संघ मंडी द्वारा स्व0 चंद्रमणी कश्यप राज्य पुरातत्व चेतना पुरस्कार से सम्मानित डाक्टर जगदीश शर्मा का कहना है इससे पहले कि अनजाने इतिहास से जुड़ी "प्रौड़" रूपी यह धर्म धरोहर व अन्य प्रतीक खण्डहर में बदल जाएं,पुरातात्विक व धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से इसके संरक्षण की बहुत जरूरत है।सुकेत संस्कृति साहित्य एवं जन कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष डाक्टर हिमेन्द्रबाली'हिम"जी का कहना है कि सुकेत का जन समूह चिरकालीन धार्मिक और सामाजिक परम्पराओं का वहन किए हुए है।आज के भौतिकवादी युग में पराभौतिक सोच क्षीण होती जा रही है।आज की वैज्ञानिकता से संपृक्ता मानसिकता आस्थामूलक धर्म को चुनौती दे रही है।परिणामस्वरूप धर्म स्थलों एवं इनसे जुड़ा इतिहास,देव गाथाएँ (गणाई),देव परंपराएं विलुप्त हो रही हैं। अतः संस्कृति के क्षयो-मुखी परिपेक्ष्य में आज विश्व संस्कृति प्रसूता भारतीय संस्कृति का संरक्षण व पुनरुत्थान आवश्यक हो गया है। नि:संदेह देव संस्कृति और लोक संस्कृति के स्वरूप में हो रहे विप्लवकारी परिवर्तन को रोकना भी बहुत आवशयक हो गया है।तभी हिमाचल प्रदेश में ही नहीं अपितु भारत वर्ष में विद्यमान बहुआयामी सांस्कृतिक धरोहरों को अक्षुण्ण रखा जा सकता है।

राज शर्मा संस्कृति संरक्षक
डॉ जगदीश शर्मा हि०प्र०