अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से अपेक्षायें - महिला सशक्तिकरण एवं कानूनी संरक्षण।

मानव समाज में नारी की स्थिति जितनी ही मजबूत होगी वह समाज उतना ही विकसित और परिपक्व होगा, क्योंकि  महिलाएं सभ्य समाज का निर्माण करने के लिये, वात्सल्य , मातृत्व की अहम् भूमिका अदा करती हैं। पुरुष प्रधान सत्तात्मक  सामाजिक ढांचे मे महिलाओं का स्तर पुरुषों के समान तो नहीं है इसका प्रमुख कारण वर्तमान समाज में महिलाएं अपने परंपरागत भूमिका में  है। सर्वत्र शोषण और यातना की शिकार हो रही महिलाओं के उन्नयन हेतु उन्हें स्वयं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना पड़ेगा। "महिला सशक्तिकरण" का आदर्श शब्द भारत ही नहीं बल्कि विश्व में एक प्रेरक मुद्दा बना हुआ है। यह तो सर्वविदित है की महिलाओं की कार्य क्षमता पुरुषों से किसी भी तरह से कम नहीं है , तो क्यों ना महिलाएं आत्मविश्वास एवं दृढ़ संकल्प लिए प्रत्येक महिला पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकती है। महिला सशक्तिकरण की व्यापकता का अर्थ बड़ा ही गूढ़ है । महिला सशक्तिकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से महिलाएं  स्वयं में जागरूक , कार्यशील ,वृहद नियंत्रण के लिए उपयुक्त होती है। किसी भी समाज में महिलाएं परिवर्तन का प्रथम नियम होती है। महिलाओं का सशक्तिकरण क्यों ? वह कमजोर कैसे ? वैदिक युग में महिलाओं के बारे में कहा जाता था - "वह नारी प्रोददरति मज्जंन भाववारिधौ" अर्थात संसार रूपी समुद्र में डूबते हुए नर का उद्धार नारी ही करती है। महाभारत के वन पर्व में नल दमयंती कथानक में  विपत्ति के समय नल का उद्धार दमयंती ने ही किया था। प्रकृति ने तो सृष्टि का निर्माण करते समय जननी वर्ग के साथ "जन्म" का अधिक प्रतिरोधक क्षमता जैसे मजबूत  पुरस्कार दिया, तो महिलाओं के साथ  ये दोहरे मानदंड क्यों अपनाए जाते हैं, उनकी शक्ति को संदेहपूर्ण  दृष्टि से देखा जाता है। आज वैश्वीकरण के इस युग में महिलाओं की परिस्थिति बदल चुकी है। विभिन्न मौकों पर महिलाओं ने अपनी शक्ति, संपन्नता,कार्य क्षमता का एहसास इस पुरुष समाज को करा दिया है। पिछले कई वर्षों से विज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी सफलता के आंकड़े का प्रदर्शन पुरुषों से ज्यादा किया है। दुनिया के कई देशों में महिलाओं ने राजनीति मे प्रतिष्ठित पद ग्रहण करके अपनी उपस्थिति पुरुषों से  ज्यादा दर्ज कराई है। "महिला सशक्तिकरण" प्रत्यय का जन्म हो चुका है। महिलाओं की परिस्थिति व उनके अधिकारों के संरक्षण एवं महिला सशक्तिकरण के लिए भारत सरकार द्वारा समय-समय पर कानूनों का प्रणयन किया गया।  चाहे वह अंग्रेजों का समय रहा हो -  सती प्रथा निषेध अधिनियम-  1829, बाल विवाह निरोधक अधिनियम - 1929, हिंदू स्त्रियों की संपत्ति का अधिकार अधिनियम - 1937, मुस्लिम शरीयत अधिनियम - 1937, मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम - 1939 इत्यादि। लैंगिक भेदभाव भारत में ही नहीं वरन संपूर्ण विश्व में नारी सशक्तिकरण की दिशा में एक बहुत बड़ी विघ्न बाधा है। भारत के कुछ पिछड़े राज्यों में कन्या भ्रूण हत्या के मामले अधिक पाए गये हैं परंतु वही भारतवर्ष का एकमात्र राज्य केरल है जहां पर महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है केरल राज्य इस बात का द्योतक है कि वहां पर महिलाएं पुरुषों से ज्यादा साक्षर है। यह तो विश्व विचारको द्वारा बहुत पहले ही कहा जा चुका है कि "आप हमें कुछ अच्छी माताएं दो मैं आपको एक अच्छा राष्ट्र दूंगा।"

मौलिक रचना 

सत्य प्रकाश सिंह

केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयागराज उत्तर प्रदेश