आत्म चिंतन

जब कभी बहस करने का मन नहीं हो, न ही ऐसी कोई पूर्व योजना बनाई गयी हो, इससे बार-बार बचने के तमाम प्रयासों के बाद भी अगर आप ऐसी कोई बात बोल जाते हैं जिससे बहस होना तय है तब उस दौरान जो कुछ घटता है वो केवल उस क्षण में नहीं घटता बल्कि घृणा योग्य स्मृति बनकर बहुत दिनों तक भीतर ही भीतर रोज़ घटता है । तब लगता है कि ऐसी कड़वाहट भरी स्मृति का भला मेरे हृदय में क्या काम? मेरा हृदय तो केवल प्रेम समेटने हेतु बना है ना या घृणा की उपज स्थली बनने के लिए ?? किंतु द्वेष ,क्रोध ,घृणा जैसी भावनाओं से कोई बच भी कहाँ सका है । जिस क्षण ये अपने सम्पूर्ण बल से शरीर , आत्मा, हृदय ,मन को वशीभूत करती है उस क्षण व्यक्ति का संयम रूपी बांध टूट जाता है और तब नितान्त गर्वित होकर अपना सिर उठाती है मनुष्य की पशुता ....और नष्ट कर देती है मधुरता से भरे सुकोमल हृदय की शांति को, छीन लेती है विचार करने की क्षमता को भी । मैंने कई पुस्तकें पढ़ीं और यह इस प्रक्रिया को समझने का प्रयास किया ,विपश्यना जैसी उत्कृष्ट विधि का पालन किया, दिन -प्रतिदिन के व्यवहार की समीक्षा की, डायरी लेखन भी करके देख लिया। अवश्य इन सभी गतिविधियों का प्रभाव हुआ किन्तु साथ ही यह समझ भी विकसित हुई मानव की प्रवृत्ति को पूर्णतया परिवर्तित कर देने की लालसा का होना भी एक प्रकार का अनावश्यक प्रयास होगा, अतः जितना सम्भव हो सके इस पर विजय पाने का प्रयास अवश्य करते रहना चाहिए जिससे कम से कम सार्थक जीवन जीने का सौभाग्य प्राप्त हो सके ।

-नित्या सिंह
युवा लेखिका/साहित्यकार
चंदौली, उत्तर प्रदेश
ईमेल : mistersingh871@yahoo.com