चुप्पी

जन्म लेते ही माँ को सुनना पड़ा
बेटी पैदा कर दी
बेटा हो जाता तो अच्छा होता
माँ भी चुप बेटी भी चुप
तब क्या बोलती
थोड़ी बड़ी हुई
भाई ने हाथ से मेरे हिस्से का
मिठाई का टुकड़ा छीना
भाई होने की धौंस भी दिखाई
माँ ने कहा फिर क्या हुआ
तेरा भाई ही तो है
मैं चुप हो गयी
छोटी बहन ने गुड़िया मांगी
माँ न कहा तेरी छोटी बहन है
उसे मत रुला
मैं चुप हो गयी
थोड़ी बड़ी हुई
माँ ने कहा तू बड़ी हो रही है
अब खेलना नही
घर के काम सीख ले
कल को दूसरे घर जाना है
मैं चुप हो गयी
और मां का कहा मान लिया
एक दिन पापा ने डांट दिया
लड़कियां ज्यादा नही बोलती
ससुराल जा कर जो चाहे करना
मैं फिर चुप हो गयी
ससुराल आयी तो
सास ननद ने बोला
खबरदार कुछ बोली तो
समझ आ गयी कि
यहां तो बोलने का हक ही नही
मैं फिर चुप हो गयी
पति को कुछ बोला
तो जवाब मिला
अपना काम करो
क्यों फालतू बोलती है
तुम्हे कुछ पता भी है
मैं फिर चुप हो गयी
बच्चों को कुछ बोला
तो उन्होंने कहा माँ
क्यों दखल देती हो
आप आराम करो न
मैं फिर चुप हो गयी
और इसी तरह चुप रहते रहते
कई बार आंखें भीगी
लेकिन आंसुओं को भी उस
चुप्पी के साथ ही दबा दिया
लगा था मुझे कि इस चुप्पी
के साथ जीते जीते
एक दिन सदा के लिए
चुप हो जाऊंगी
पर फिर एक दिन एक रोशनी
की किरण मिली जो सालों से
इस चुप्पी की तहों के नीचे
जो गुबार दबा पड़ा था
उसको बाहर निकालने लगी
आखिर मुझे भी कुछ ऐसा मिला
जो शायद मेरी इस चुप्पी
को आवाज़ दे ही देगा
क्योंकि मैंने अब
कलम जो उठा ली है
और पन्ने दर पन्ने भरने लगी
इस चुप्पी के बन्द दरवाजों की
गिरहें खोल खोल कर
उसमे परत दर परत दबे
मलाल को बाहर निकालने लगी।

स्वलिखित एवम मौलिक
रीटा मक्कड़