आज फिर ज़रूरत है तेरी

माँ बचपन से ज़रा सी भी

चोट लगती थी जब

कैसे दौड़ कर आ बाहों में

भर लेती थी

और हाथ फेर गालों से

पोंछ डालती थी आँसू सारे

माँ फिर थोड़ा बड़े होने पर

बन गयी बहन और सखी भी तू 

कितना आसान होता था दिल की हर बात को तुझ से कह देना

और तेरा हर बात को यूँ  प्यार से सुलझा देना

माँ हर कदम चली साथ तू मेरे 

रही सुख की छांव या दुख की धूप

कभी हारने या टूटने नहीं दिया हौंसला मेरा

माँ दिल को आज फिर ज़रूरत है तेरी

माँ गालों से ढुलकते आँसूओं को आज फिर ज़रूरत है तेरी

माँ उलझनों को सुलझाने में

आज फिर ज़रूरत है तेरी

माँ समझ कर भी समझ नहीं पाती दुनिया को

क्यों चलती है चालों पर चालें

क्यों लगती है दिल पर ठेस

क्यों बेवजह रिश्ते बदलते हैं रंग

माँ आज फिर ज़रूरत है तेरी

इस दिल को

वही बचपन सी सिमटने को तेरी बाहों में

गोद में सिर रख हर बात को

 हर रिश्ते को समझने की

आखिर क्यों इतने बेदिल और बेरंग है ये दुनिया

जो थकती नहीं दे दर्द बिन बात

माँ आज फिर ज़रूरत है तेरी

उबारने को इस दर्द के भंवर से जो न जीने दी जी भर न मरने दे हो निराश

माँ आज फिर ज़रूरत है तेरी

खुद को तेरी बाहों में समेटने की और खुल कर रो जी हल्का करने की।।

.....मीनाक्षी सुकुमारन

      नोएडा