होली का चमत्कार।

शर्मा जी का परिवार और सिंह साहब का परिवार एक दूसरे के कट्टर दुश्मन हो गए थे। शर्मा जी और उनके बेटे पूरे शहर में पंडिताई करते थे, लोगों के घरों में पूजा पाठ उनका नित्य कर्म था। सदाचारी और शाकाहारी परिवार, पत्नी तथा बेटी भी अत्यंत शालीन, मृदुभाषी और धर्म परायण, वहीं पड़ोसी सिंह साहब बड़े ठेकेदार, मांसाहारी थे। जब भी उनके यहां नॉनवेज बनता शर्मा जी के घर में पूरी महक भर जाती है, और बचे कुचे मांस के लोथडे दरवाजे के बाहर फेंक दिए जाते थे, शर्मा परिवार और सिंह परिवार में इसी बात की बड़ी लड़ाई और वैमनस्यता भरी हुई थी। यहां तक की पुरुषों में इस बात को लेकर बातचीत बंद थी। पर इस होली में शर्मा जी के घर सिंह साहब खुद मिठाई, घर की बनी खीर लेकर सपरिवार आए थे। पहले तो शर्मा जी को आश्चर्य हुआ मिठाई तथा खीर लेने से मना करने लगे, पर सिंह साहब की पत्नी ने कहा भाई साहब ले लीजिए इसमें कहीं भी कुछ भी नहीं मिला है, आज से सिंह साहब ने आप लोग को देख कर प्रण लेकर मांसाहार भी त्याग दिया है, शर्मा परिवार की खुशी का ठिकाना न रहा, उन्हें ईश्वर पर और विश्वास हो गया। दोनों ने रंग गुलाल लेकर भाईचारे से होली का त्यौहार मना कर एक दूसरे को गले से लगा लिया। उन्होंने सिंह परिवार को बधाई देकर कहा यह तो ईश्वर की कृपा है जो होली जैसे पवित्र त्यौहार में आपने यह सौगंध ले ली आप भी शाकाहारी हो गए।

संजीव ठाकुर

कथाकार, कवि, रायपुर छत्तीसगढ़,9009 415 415