नये सृजन का नया सवेरा

सृजन हेतु तस्वीर नई आंखों में सजती,
मन के गलियारे में एक उम्मीद है पलती।
इच्छाएं अनन्त बलवती मानव समाज की,
अंधियारा प्रकाश में बदले मन के साज की।
जीवन मिला, चपलता से कुछ नया करें हम,
पूर्ण विराम जगह न लेवे अडिग रहे हम।
बहता जल नदिया का जीवन रक्षक बनता,
वो ही जल स्थिर हो रोग का वाहक बनता।
नए सृजन की हिम्मत जिसने भी है दिखाई,
रचना नए इतिहास की करके जगह बनाई।
नए अविष्कारों को जगह अगर न मिलती,
नूतन युग में यह प्रकाश की कली न खिलती।
पथ पर हुआ अग्रसर जब साहस कर मानव,
ऊंचे पर्वत,गहरे सागर सब सिमटे घर आंगन।
क्रियाशीलता क्षमता सीमाओं में बंध न जाए,
नए सृजन का नया सवेरा जीवन में आ आए।

सीमा मिश्रा