बारिश की बूँदें

बारिश की हल्की हल्की बूँदें,
तरसते हुए लम्हों को ढूँढे।
वो जो बरसों से हैं प्यासे,
तृप्त ये उनको करना चाहे।
न ही किसी से कोई अभिलाषा,
न ही किसी से जुड़ी है आशा।
निस्वार्थ भाव से ये ढूढ़ती है,
सुगंध सी फूलों को सूंघती है।
न छल, न लालसा, न स्वार्थ,
बरसता हर एक बूंद निस्वार्थ।
अविरल है प्रेम ,स्नेह इनका,
वास्ता है, मेल है इनसे जिनका।
खिल जाती सृष्टि की हर रचना,
प्रबल हो जाती हर संरचना।
बूंद बूंद में है अमृत कलश,
हो जाए जीवन का हर क्षण सरस।

डॉ0शीला चतुर्वेदी, प्रधानाध्यापक,
प्रा0वि0बैरौना, देवरिया सदर, देवरिया
उत्तर-प्रदेश