खेला जारी है ...

ईमानदारी इस क़दर हावी है राजनीतिक जमात में ,

कोई राज़ छुपाए बैठा है तो कोई दाग छुपाए बैठा है ।

खेला तो अनवरत जारी है , हर बार जनता हीं हारी है ,

फिर से राजनेता मतदाता की कमजोर नस दबाए बैठा है ।

पाँच साल तक जिसे जनता से ना था कोई सरोकार ,

रंग-बिरंगे वादों का वह फ़िर से दुकान सजाए बैठा है ।

चाल-चरित्र और चेहरा वही बस कलेवर बदल रहे ,

राजनीतिक अखाड़े में हर कोई गंगा नहाए बैठा है ।

माँ पिट रही , माटी लूट रही , मानुष बेहाल है मग़र ,

तुष्टिकरण के हथियार से कोई सबको डराए बैठा है ।

साम , दाम , दंड , भेद , हमेशा काबिज़ रहा वोटबैंक पर ,

सहानभूति की आस में फ़िर से कोई चोट लगाए बैठा है ।

इतिहास दोहराया जा रहा , फ़िर से चल रहा है प्रयोग ,

गांधी-नेहरू विचाधारा , जिन्ना से हाथ मिलाए बैठा है ।

राम का नाम हीं साम्प्रदायिक लगता है जिन्हें ,

वो देखो आज मस्जिद में टोपी लगाए बैठा है ।

लोकतंत्र के पावन यज्ञ की पूर्णाहुति तो हो जाती है मग़र ,

प्रसाद की कतार में मतदाता कब से पत्तल बिछाए बैठा है ।

सुभाष चंद्र झा 'अकेला '

जमशेदपुर , झारखंड