उफ ये मुहब्बत

मुहब्बत हाँ ये मुहब्बत
मकड़ी के जाले की मानिंद
हर पल, हर साँस में
फाँसती ही जाती है
नहीं मिलता है सिरा
इसके सहर से
छटपटाता है इस कदर
बचने को ये दिल
पर ये छोड़ती ही नहीं है
हाँ कभी-कभी तो ये मुहब्बत
ऑक्टोपस की तरह
शिकंजे में कस लेती है
सोख लेती है खूं का
एक-एक कतरा
जिस्म से साँस तक,
आह से आवाज तक,
पर कहीं नहीं है ठिकाना
सिवाय जकड़े जाने का,
उफ! ये मुहब्बत

प्रवीणा दीक्षित,वरिष्ठ शिक्षिका व
कवयित्री,स्वतन्त्र लेखिका व स्तम्भकार
जनपद- कासगंज